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________________ जीवाजीवाधिकार १२७ तो वानां प्रज्ञापतेपि निश्चयतो नित्यमेवामूर्तस्वभावस्योपयोगगुणेनाधिकस्य जीवस्य सर्वाण्यपि न संति तादात्म्यलक्षरण संबंधाभावात् ।।५८-५६-६० ।। हारतः - पंत्रम्यां तसल अध्यय उक्तः प्रथमा एक. कृदंत, गंधरसस्पर्शरूपाणि- प्रथमा बहु०, देहः - प्रथमा एक०, संस्थान - प्रथमा एक०, आदयः - प्रथमा बहु०, ये प्रथमा बहु०, सर्वे - प्रथमा बहु०, व्यवहारस्य - पष्ठी एक०, निश्चयद्रष्टारः - प्रथमा ब०, व्यपदिशति-वि-अप दिशंति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष बहु० ।। ५६-६० ।। कि वर्णादिक तो पुद्गल के प्राश्रित हैं वे जीवके नहीं हैं । सिद्धान्त - ( १ ) एक जातिके पदार्थ के प्राधार में अन्य जातिके आधेय पदार्थका आरोप करना आरोपक अभूतव्यवहार है । ( २ ) जिस विभाग पर्यायका जो उपादान है उसको उसमें ही बताना प्रयोजक व्यवहार है । दृष्टि - १ - एकजात्याधारे अन्यजात्याधेयोपचारक व्यवहार (१४०) । २ - अशुद्ध निश्चयनय, अशुद्धपर्यायविषयी व्यवहारनय (४७, ५२ ) । प्रयोग - किसी भी उपचार कथनसे उसके प्रयोजनमात्रको जानकर आगे प्रगतिके लिये निश्चयनयका प्राश्रय करके सर्वविकल्पातिक्रान्त श्रन्तस्तत्त्वको अनुभवना चाहिये ||१८० ५६ ६०॥ यहाँ प्रश्न होता है कि वर्णादिके साथ जीवका तादात्म्य सम्बंध क्यों नहीं है ? उसका उत्तर कहते हैं - [रादयः ] जो वर्णं प्रादिक हैं ये [संसारस्थानां जीवानां] संसारमें स्थित atric [भ] उस भव में [ भवन्ति ] होते हैं [ संसारप्रमुक्तानां ] किन्तु संसारसे छूट गए या मुक्त हुए जीवों [ खलु ] निश्चय से [वरपदयः केचित् ] वर्णादिक कोई भी [ न संति ] नहीं हैं । इसलिये तादात्म्य सम्बंध भी नहीं है । तात्पर्य- केवल संसारदशा में देहादि में वर्णादि होते हैं मुक्तदशामें नहीं होते, अतः सदा न होनेसे जीवका वर्णादिसे तादात्म्य सिद्ध नहीं होता । टीकार्थ-नो निश्चय से सब प्रवस्थानों में जिस स्वरूपसे व्याप्त हो और जिस स्वरूपकी व्याप्तिसे रहित न हो, उस वस्तु के साथ उन भावोंका तादात्म्य सम्बंध होता है । इसलिए सब ही श्रवस्थाओं में वर्णादिरूपसे व्याप्त हुए और वर्णादिकको व्याप्तिसे शून्य न हुए पुद्गल द्रव्यका वर्णादिक भावोंके साथ तादात्म्य सम्बन्ध है । श्रीर संसार - अवस्था में कथंचित् वर्णादि स्वरूपसे हुए तथा वर्णादि स्वरूपकी व्याप्तिसे शून्य न हुए जीवका मोक्ष अवस्था में सर्वथा वर्णादि स्वरूपकी व्याप्तिसे शून्य होनेके कारण तथा वर्णादि स्वरूपसे व्याप्त न होने के कारण वर्णादि भावोंके साथ तादात्म्य सम्बन्ध किसी प्रकार भी नहीं है । भावार्थ -- जो वस्तु जिन भावोंसे सब अवस्थामों में व्याप्त हो उस वस्तुका उन भावों
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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