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________________ ܐ समयसार ननु वर्णादयो यथमी न संति जीवस्य तथा तंत्रांतरे कथं संतीति प्रज्ञाप्यते इति चेत्ववहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वरणमादीया | ठाताभावादु केई मिच्छययस्स ॥५६॥ भाव व्यवहारसे ये वर्णादिक गुणस्थान तक सारे । बतलाये किन्तु निश्चय नयसे नहिं जीव के कोई ।। ५६ ।। araहारेण त्वेते जीवस्य भवंति वर्णाद्याः । गुणस्थानांता भावा न तु केचिन्निश्चयनयस्य ॥ ५६ ॥ इह हि व्यवहारनयः किल पर्यार्याश्रितत्वाज्जीवस्य पुद्गलसंयोगवशादनादिप्रसिद्ध बंधपर्यायस्य कुसुंभरक्तस्य कार्पासिकवासस इवोपाधिकं भावमालंब्योल्लवमानः परभाव परस्य विदघाति । निश्चयनयस्तु द्रव्याश्रितत्वात्केवलस्य जीवस्थ स्वाभाविकं भावमवलंब्योत्प्लवमानः पर नामसंज्ञ- यवहार, दु, एत, जीव, वण्णमादीय, गुणठाणंत, भाव, ण, दु, केई, णिच्छयणय । धातुसंज्ञ--- हव सत्तायां, ने प्रापणे । प्रकृतिशब्द व्यवहार, तु, एतत्, जीव, वर्णाद्य, गुणस्थानान्त, भाव, न, सु, fr. निश्चयनय । मूलधातु-वि अव हुत्र हरणे भ्वादि, भुसत्तायां णीञ प्रापणे । पदविवरण- व्यवहा स्वभावकी दृष्टि व उमंग होने की घटना में विकार पुद्गलस्वामिक विदित होते हैं । दृष्टि - १ -परद्रव्यादिग्राहक द्रव्याणि i (२०) २ - उपाधिज उपचरित प्रतिफलन व्यवहार (१०३ प्र ) । ३ - विवक्षितक देश शुद्ध निश्चयनय ( ४ ) | प्रयोग -- निमित्त व नैमित्तिक अन्य भावोंसे हटकर शुद्ध ज्ञायकस्वभावमय अन्तस्तत्त्व में निःशङ्क प्राराम लेना चाहिये ।। ५०-५१-५२-५३-५४-५५ ।। अब शिष्य पूछता है कि वर्णादिक भाव जो कहे गये हैं वे यदि जीवके नहीं हैं तो अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों में 'ये जीवके हैं' ऐसा क्यों कहा गया ? उसका उत्तर गाथामें कहते हैं[ एते ] ये [ वर्णाचा: गुरणस्थानाताः भाषाः ] वरणं आदि गुणस्थानपर्यन्त भाव [ व्यवहारेण सु] व्यवहारनयसे तो [ जीवस्य भवंति ] जीवके होते हैं, इसलिये सूत्रमें कहे हैं, [तु] परंतु [निश्चयनयस्य ] निश्चयनयके मतसे [ केचित् न ] उनमें से कोई भी भाव जीवके नहीं है । तात्पर्य - वर्णादि गुणस्थानपर्यन्त भाव निश्चयनयसे जीवके नहीं, ये व्यवहारनयसे जीवके कहे गये हैं । टीकार्थ -- यहाँपर व्यवहारनय, पर्यायाश्रित होनेसे पुद्गलके संयोगवश अनादिकाल से प्रसिद्ध जिसकी बंधपर्याय है ऐसे जीवके 'कुसुम्भके लाल रंगसे रंगे हुए रुईके वस्त्रकी भांति' श्रोपाधिक वर्णादिभावोंको श्रालम्बन कर प्रवृत्त होता है, इसलिये वह व्यवहारनय दूसरे के भावों को दूसरोंका कहता है । किंतु निश्चयनय द्रव्यके आश्रय होनेसे केवल एक जीवके स्वाभा far भावको अवलम्बन कर प्रवृत्त होता है, वह सब परभावोंको परके कहता है, निषेध करता है, इसलिये वर्ण आदि गुरणस्थानपर्यंत भाव व्यवहारनयसे जीवके हैं, निश्चयनयसे नहीं हैं,
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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