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________________ समयसार नान्यस्य चित्स्वभावस्य विवेचकः स्वयमुपलभ्यभानत्वात् । न खलु सातासातरूपेणाभिव्याप्तसमस्ततीव्रमंदत्वगुणाभ्यां भिधमानः कर्मानुभावो जीवः सुखदुःखातिरिक्तत्वेनान्यस्य चित्स्वभावस्य विवेचकैः स्वयमुपलभ्यमानत्वात् । न खलु मज्जितावदुभयात्मकत्वादात्मकर्मोभयं जीवः कात्स्य॑तः कर्मणोतिरिक्तत्वेनान्यस्य चित्स्वभावस्य विवेचकैः स्वयमुपलभ्यमानत्वात् । न खल्वर्थक्रियासमर्थः कर्मसंयोगो जीवः कर्मसंयोगात्खदवाशायिनः पुरुषस्येवाष्टकाष्ठसंयोगादतिरिपदविवरण-एते--प्रथमा ब० । सर्वप्रथमा ब० । भावा:-प्रथमा ब. कर्मवाच्ये कर्म । पुद्गलद्रव्यपरिणामनिष्पन्ना-प्रथमा बहु । केवलिजिनः तृतीया ब० कर्मवाच्यमें कर्ता । भणिता:-प्रथमा ब० कर्मवाच्य में ऐसा काव्यमें कहते हैं 'विरम' इत्यादि । अर्थ-हे भव्य, तुझे निष्प्रयोजन कोलाहल करने से क्या लाभ है, उस कोलाहलसे तू विरक्त हो और एक चैतन्यमात्र बस्तुको एकान्तमें स्वयं निश्चय लीन होकर छः महीना अभ्यास कर देख तो कि जिसका तेज प्रताप-प्रकाश पुद्गलसे भिन्न है ऐसे प्रात्माकी अपने हृदयसरोवरमे प्राप्ति होती है या नहीं। भावार्थ--यदि अपने स्वरूपका अभ्यास करे तो उसकी प्राप्ति अवश्य होती है, हाँ पर वस्तुको प्राप्ति नहीं हो सकती । अपना स्वरूप तो विद्यमान ही है परन्तु भूल रहा है सो चेत कर देखे तो पास ही है । यहाँ छह महीने का अभ्यास कहा सो ऐसा नहीं समझना कि इतना ही समय लगेगा, इसका होना तो अन्तर्मुहूर्समात्रमें ही है परन्तु शिष्यको बहुत कठिन मालूम पड़े तब उसको समझाया है कि यदि बहुत काल भी समझने में लगेगा तो छह महीनेसे अधिक नहीं लगेगा। इसलिए अन्य निष्प्रयोजन कोलाहलको छोड़ इसमें लगनेसे शीघ्र स्वरूपको प्राप्ति होगी, ऐसा उपदेश किया है। _प्रसंगधिवरण-प्रनन्तरपूर्व ५ गाथावोंमें प्रशजनसम्मत जीवके परिचयका निर्देश किया था और अन्त में कहा था कि ऐसा कहने वाले याने परको प्रात्मा कहने वाले परमार्थवादी नहीं है । सो उसी तथ्यका इस गाथामें वर्णन है कि पूर्वोक्त परात्मवादी किस कारणसे परमार्थवादी नहीं है। तथ्यप्रकाश-१-पूर्वगायोक्त ८ प्रकारका परात्मवाद परमार्थवाद नहीं है यह प्रागम से सिद्ध है। २-पूर्वगाथोक्त ८ प्रकारका परात्मवाद युक्ति और अनुभवसे अथवा स्वानुभव. गर्भित युक्तिसे भी सिद्ध नहीं होता। ३-स्वानुभवगभित युक्ति यह है कि-उन कल्पित ८ प्रकारोंसे अन्य चित्स्वभावमात्र अन्तस्तत्व भेदविज्ञानियों द्वारा स्वयं उपलभ्यमान हुआ है । ४-यहाँ प्रात्मोपलब्धिके अर्थ छह माह तक भी पुरुषार्य करनेका जो उपदेश किया है उसका कारण यह है कि अनंतानुबन्धी कषाय सम्यक्त्वघातक है और उस कषायका संस्कार छह
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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