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________________ ६४ समयसार स्वरूपसंपदा विश्वे परिस्फुरत्यपि न किंचनाप्यन्यत्परमाणुमात्रमप्यात्मीयत्वेन प्रतिभाति । यद्भावकत्वेन शेयत्वेन चैकोभूय भूयो मोहमुद्भावयति स्वरसत एवापुनःप्रादुर्भावाय समूलं मोहमन्मूल्य महतो ज्ञानोद्योतस्य प्रस्फुरितत्वात् । मज्जंतु निर्भरममी सममेव लोका आलोकमुच्छलति थांतरसे समस्ताः । प्राप्लाव्य विभ्रमतिरस्करिणी भरेण प्रोन्मान एष भगवानवबोधसिंधुः ।।३२।। ॥३८॥ इति श्रीसमयसारव्याख्यायामात्मख्यातो 'पूर्वरंग:' समाप्तः । अव्यय । शुख:-प्रथमा एक०। दर्शनशानमयः-प्रथमा एक० । सदा-अव्यय । अरूपी-प्रथमा एक० । नअव्यय । अस्ति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया । मम--षष्ठी एक० 1 किंचित् अव्यय । अन्यत्-प्रथमा एक० । अपि-अव्यय । अन्यत्-प्रथमा एक० । परमाणुमात्र-प्रथमा एकवचन । अपि-अव्यय ॥३८॥ रसमें उन्हें लीन कर सम्यादृष्टि बनाता है। उसकी सूचनारूप रंगभूमिके अन्तमें प्राचार्यने "मज्जंतु' इत्यादि श्लोक जो रचा है, वह अब आगे जीव अजीवके एकत्वका स्वांग वर्णन करेंगे इसकी सूचनारूप है । इस प्रकार यहाँ तक रंगभूमिका वर्णन किया । प्रसंगविवरण-वर्तमान निश्चयस्तुतिके प्रकरण में प्रस्नमें यह सिद्ध किया गया था कि प्रात्माका दर्शन, शान, चारित्रमें परिणत होनेका वर्णन करना सत्य स्तवन है। अब यहाँ यह बता रहे हैं कि दर्शन, ज्ञान, चारित्रमें परिणत हुये प्रात्माको कैसा स्वरूपसंचेतन होता है । तथ्यप्रकाश-(१) मोहीमत जीव अत्यन्त प्रतिबुद्ध होता है । (२) अन्तस्तत्त्व तो मदा अन्तः है, उसकी सुध होना ही आत्मलाभ है । (३) अनन्तगुणपर्यायात्मकता विदित होने पर भी प्रात्मा चैतन्यमात्र स्वरूपमें अभेद होनेसे एक है । (४) ज्ञायकस्वभाषमात्र होनेसे अनेक विध पर्याय व पुण्य-पापादि तत्वोंसे निराला होनेके कारण भात्मा शुद्ध है । (५) सामान्यविशेषात्मक प्रतिभासस्वरूप होनेसे पारमा दर्शनज्ञानमय है । (६) रूपी पदार्थ भी शेय हों तो भी कभी भी रूपादिरूप न होनेसे प्रात्मा प्ररूपी है । (५) जानोको कुछ भी अन्य द्रव्य प्रात्मीय रूपसे विदित ही नहीं होता सो कोई भी अन्य द्रव्य भावकरूपसे या ज्ञेयरूपसे एकरूप हो ही नहीं सकता, अतः मोहकी उत्पत्ति असंभव है। सिद्धान्त-(१) प्रात्मा स्वकीयचैतन्यस्वरूपमें अभेद होनेसे प्रखण्ड एक है । (२) मात्मा सर्वविकल्पोंसे विविक्त होनेसे शुद्ध है। सृष्टि-१- परमशुद्धनिश्चयनय (४४) । २- शुद्धनय (४६) । प्रयोग-अपनेको अरूपी व एक निरखकर सर्व विकल्पोंसे परे होकर शुद्ध प्रतिभास. मात्र अनुभवना चाहिये ॥३८॥ इस प्रकार समयसारथ्याच्या पात्मख्यातिमें 'पूर्व रंग' समाप्त हुआ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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