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________________ समयसार अथवं दर्शनशानचारित्रपरिणतस्यास्यात्मनः कोहक स्थरूपसंचेतनं भवतीत्यावेदयन्नुपसंहरति अहमिक्को खलु सुद्धों दसणणाणमइयो सदारूबी। दि अस्थि मा किंचिति अग परमाणुमित्तंपि ॥३॥ मैं एक शुद्ध चिन्मय, शुचि दर्शनशासमय प्ररूपी हूं। अन्य परमाणु तक भी, मेरा कुछ भी नहीं होता ॥३॥ अहमेक; खन्नु शुद्धो दर्शनज्ञानमयः सदाऽरूपी। नाप्यस्ति मम किंचिदप्यन्यत्परमाणुमात्रमपि ॥३८॥ यो हि नामानादिमोहोन्मत्ततयात्यंतमप्रतिबुद्धः सन् निविणेन गुरुणानवरतं प्रतिबोध्यमानः कथं चनापि प्रतिबुध्य निजकरतल विन्यस्तविस्मृतचामीकरावलोकनन्यायेन परमेश्वरमात्मानं ज्ञात्वा श्रद्धायानुचर्य च सभ्यगेकात्माराभो भूतः स खल्वहमात्मात्मप्रत्यक्षं चिन्मात्र ज्योतिः । समस्तक्रमाक्रमप्रवर्तमानव्यावहारिकभावैश्चिन्मात्राकारेणाभिद्यमानत्वादेको नारकादिजीवविशेषाजीवपुण्यपापास्त्रवसंवरनिर्जराबंधमोक्षलक्षणव्यावहारिकनवतत्वेभ्यष्टकोत्कीर्णेकज्ञा. नामसंज्ञ-अम्ह, इक्क, खलु, सुद्ध, दसणणाणम इअ, सदा, अरूवि, ण, बि, अम्ह, किचि, वि, अण्ण, परमाणु मित्त, पि । धातुसंज्ञ-सुज्झ शौचे, अस सत्तायां, दंस दर्शनायां । प्रातिपदिक-अस्मद्, एक, खलु, स्वयं नहीं परिणमनेके कारण वास्तव में सदा ही अरूपो हूँ। ऐसे सबसे पृथक् स्वरूपका अनुभव करता हुग्रा में प्रताप सहित हूं। ऐसे प्रताप रूप हुए मुझमें बाह्य अनेक प्रकार स्वरूपकी सम्पदासे समस्त परद्रव्य स्फुरायमान हैं तो भी परमाणु-मात्र द्रव्य भी मुझे प्रात्मीय रूप नहीं प्रतिभासित होता जिससे कि मेरे भावकरूपसे तथा ज्ञेयरूपसे मुझसे एक होकर फिर मोह उत्पन्न करे । क्योंकि मेरे निज रससे ही ऐसा महान् ज्ञान प्रकट हुआ है, जिसने मोहको मूलसे उखाड़ कर दूर किया है, जो फिर उसका अंकुर न उपजे ऐसा नाश किया है। भावार्थ-- यह प्रात्मा अनादिकाल से लेकर मोहके उदयसे अज्ञानी था, सो श्रीगुरुके उपदेशसे और अपनी अच्छी होनहारसे ज्ञानी हुमा, अपने स्वरूपको परमार्थ से जाना कि मैं एक है, शुद्ध हूँ, अरूपी हूँ, दर्शन ज्ञानमय हूँ। ऐसा अन्तस्तत्त्व जाननेसे मोहका समूल नाश हुआ, भावकभावसे और ज्ञेयभावसे भेदज्ञान हुअा, स्वरूपसम्पदा अनुभबमें आई, तब फिर मोह क्यों उत्पन्न होगा? अब जिस प्रात्माका अनुभव हुमा, उसकी महिमा प्राचार्य कहकर आशीर्वाद देते हैं कि ऐसे ज्ञानस्वरूप प्रात्मामें समस्त लोक मग्न होवे 'मज्जंतु' इत्यादि । प्रर्थ—यह ज्ञानसमुद्र भगवान् प्रात्मा विभ्रमरूप चादरको शक्तिसे डुबोकर (दूर कर) पाप सर्वांग प्रकट हुना है सो ग्रन समस्त लोक इसके शांतरसमें एक ही समय अतिशयसे मग्न होवे । जो शांतरस समस्त
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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