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________________ पूर्व रंग ग्निः पुनर्भविष्यत्यग्नेरग्निः पुनर्भविष्यतीधनस्य धनं पुनर्भविष्यतीति कस्यचिदग्नावेव सदभूताग्नि विकल्पवन्नाहमेतदस्यि जबलस्त्यहाहात्म्येतदेतदरित न भमंजपत्ति नैतस्याहमस्मि ममाहमस्म्येतस्यैतदस्ति न ममैतत्पूर्वमासीनतस्याहं पूर्वमासं ममाहं पूर्वमासमेतस्यैतत्पूर्वमासीन ममतत्पुनर्भविष्यति नैतस्याहं पुनर्भविष्यामि ममाहं पुनर्भविष्याम्येतस्यैतत्पुनर्भविष्यतीति स्वद्रव्य एव सद्भूतात्मविकल्पस्य प्रतिबुद्धलक्षणस्य भावात् । त्यजतु जगदिदानी मोहमाजन्मलीढं रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत् । इह कथमपि नात्मात्नात्मना साकमेकः किल कलयति काले क्वापि तादाम्त्यवृत्ति ।।२२॥२०-२१-२२।। पूर्व-प्रथमा एक० अथवा अव्यय । एतत्-प्रथमा एक० । एतस्य-षष्ठी एक० । अहं-प्रथमा एक० । अपिअव्यय । आसम्-भूते लुङ उत्तम एक० क्रिया । भविष्यति-लट भविष्यत् अन्य एकत्रिया. पुनः अव्यय । मम-षष्ठी एकः । भविष्यामि-भविष्यत् लट उत्तम पुरुष एक० किया । एतत्-प्रथमा एक० । तु--अव्यय । असद्भूतं-द्वितीया एक० कर्मविशेषण | आत्मविकल्प-द्वितीया एक कर्मकारक । करोति--वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया । संमूढः-प्रथमा एकवचन। भूतार्थ--द्वितीया एकवचन । जानन्-प्रथमा विभक्ति एकवचन वादन्त । न-अव्यय । करोति--वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया। तु-अव्यय । तं--वि० ए० कर्म । असमूढः-प्रथमा एकवचन कर्ता ।।२०-२१-२२॥ अनादिसे लगा हुआ जो परद्रव्यसे मोह है उस एकपनेके मोहको अब छोड़ो और ज्ञानका नास्वादन करो। मोह वृथा है, मिथ्या है, दुःख का कारण है। ऐसा भेदविज्ञान करना है । प्रसंगविवरण-मनन्तर पूर्व बताया गया था कि यह प्रात्मा कब तक अज्ञानी रहता है । अब उसीके विषयमें बताना है कि वह कैसे पहिचाना जाता है कि यह अज्ञानी है, इसका विवरण इन तीन गाथावोंमें बताया गया है । तथ्यप्रकाश---(१) जो परद्रव्यमें ऐसा विश्वास रखता है कि "मैं यह हूं या यह मैं है" वह जीव अज्ञानी है । (२) जो परद्रव्यमें ऐसा विश्वास रखता है "मेरा यह है या इसका मैं हूँ" वह अज्ञानी है । (३) जो परद्रव्यमें ऐसा विश्वास रखता है कि मेरा यह पहिले था या इसका मैं पहिले था" वह अज्ञानी है । (४) जो परद्रव्यमें ऐसा विश्वास रखता है कि मेरा यह फिर होगा या इसका मैं फिर होऊँगा वह अज्ञानी है। सिद्धान्त----उक्त चार बातें मिथ्या हैं जिनकी दृष्टियां उपचारसम्बंधी निम्नलिखित हैं । दृष्टि---१- द्रव्ये द्रव्योपचारक असद्भूतव्यवहार (१०६)। २, ३, ४- परसम्बन्धव्यवहार (१३५) । प्रयोग- तथ्यप्रकाशमें बताये गये उपचारको मिथ्या जानकर अपने में परद्रव्यके विषयमें ऐसा निर्णय करना चाहिये कि मैं यह नहीं हूं, यह मैं नहीं है, मेरा यह नहीं है, इसका मैं नहीं हूं, मेरा यह नहीं था, इसका मैं नहीं था, मेरा यह कभी नहीं होगा, इसका मैं
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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