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________________ पूर्व रंग पुद्गलपरिणामेष्वमित्यात्मनि च कर्ममोहादयोऽन्तरंगा नोकर्मशरीरादयो बहिरंगाश्चात्मतिरस्कारिणः पुद्गलपरिणामा अमी इति वस्त्व भेदेन पावंतं कालमनुभूतिस्तावंतं कालमात्मा भवत्यप्रतिवुद्धः । यदा कदाचिद्यथा रूपिणो दपरणस्थ स्वपराकारावभासिनी स्वच्छतब वह रौष्ण्यं अहक, च, कर्मन्, नोकर्मन्, यावत्, एतत्, खलु, बुद्धि, अप्रतिबुद्ध, तावत् ! मूलधातु-टकृत करणे, बुध अवगमने, भु सत्तायां । पदविवरण-कर्मणि-सप्तमी एकवचन | नोकर्मणि-सप्तमी एक । च-अव्यय । अहं-प्रथमा एक० । इति-अव्यय । अहङ्क-प्रथमा एक० । कर्म-प्रथमा एक० । नोकर्म--प्रथमा एक० । जायगी तब ही यह प्रात्मा प्रतिबुद्ध (शानी) होगा। भावार्थ--जन तक जीव ऐसा जानता है कि जैसे स्पर्श आदिक पुद्गलमें हैं और पुद्गल स्पादिमें है उसी तरह जीवमें फर्म नोकर्म हैं और कर्म नोकर्ममें जीव है तब तक तो वह अज्ञानी है और जब यह जान ले कि प्रात्मा तो ज्ञानस्वरूप ही है और कर्म नोकर्म • पुद्गल ही हैं तभी यह ज्ञानी होता है। जैसे दर्पणमें अग्निकी ज्वाला दीखती हो, वहाँ ऐसा जाने कि ज्वाला तो अग्निमें ही है, दर्पणमें नहीं बैठी, जो दर्पणमें दीख रही है वह दर्पणकी ‘स्वच्छता ही है । इसी तरह कर्म नोकर्म अपने आत्मामें नहीं बैठे, आत्माके ज्ञान की स्वच्छता ऐसी है जिसमें ज्ञेयका प्रतिभास होता है । इस प्रकार कर्म नोकर्म ज्ञेय हैं, वे मात्र प्रतिभामित होते हैं, ऐसा अनुभव स्वयमेव हो अथवा उपदेशसे हो तब हो ज्ञानी होता है । .. अब इसी अर्थका कलशरूप काव्य कहते हैं "कथमपि" इत्यादि । अर्थ-जो पुरुष प्रापसे ही अथवा परके उपदेशसे किसी तरह भेदविज्ञानमूलक अविचल निश्चल अपने प्रात्मा की अनुभूतिको प्राप्त करते हैं, वे ही पुरुष दर्पणकी तरह अपने मात्मामें प्रतिबिम्बित हुए अनंत भावोंके स्वभावोंसे निरन्तर विकाररहित होते हैं । भावार्थ-ज्ञान में प्रतिफलित ज्ञेयाकारों ज्ञानी विकृत नहीं बनते। प्रसङ्गविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें ज्ञानमय प्रात्माकी उपासनाके प्रकरणमें यह प्रश्न हुमा था कि आत्मा तो ज्ञानमय है ही उसको उपासनाका उपदेश बेकार है उसके उत्तर में कहा था कि प्रात्मा ज्ञानमय तो है, किन्तु उसका ज्ञान न होनेसे अज्ञानी है, अतः उसे ज्ञान की उपासनाका उपदेश किया जाता है । इसपर यह प्रश्न हुना कि फिर यह कितने समय तक अज्ञानी रहता है । इस प्रश्नका उत्तर इस गाथामें दिया गया है । तथ्यप्रकाश-(१) अज्ञानीको घटमें घटाकारादिके अभेदकी भाँति विभाव व देह में "मैं हूँ" की अभेदसे अनुभूति रहती है । (२) ज्ञानीको दर्पण और जिसका दर्पणमें प्रतिबिम्ब हमा, ऐसे अग्निकी उष्णता व ज्वालाके भेदकी तरह, अपनी ज्ञातृता (ज्ञातापन) व पुदुमलोंकी देहादिदशाका भेद ज्ञात रहता है और इस भेदविज्ञानके परिणाममें अपनेको ज्ञानमात्र अनुभ
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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