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________________ ! रयणसार ६७ जो न्यूनता अधिकता हित हैं, याथातथ्य है, विपरीतता से रहित है, संदेह रहित है तथा तर्क या प्रत्यक्ष अनुमान आदि से उल्घंनीय नहीं हैं वह सर्वज्ञ जिनेन्द्रदेव का वचन प्रवचनसार - जिनागम हैं । स्वाध्याय ही परम तप हैं- "स्वाध्यायो परमः तपः " स्वाध्याय ही परम ध्यान है क्योंकि १. ध्यान के समान ही स्वाध्याय में मन-वचन-काय तीनों की एकाग्रता होती है । २. स्वाध्याय करने से अज्ञान का नाश व ज्ञान का प्रकाश होता है । ३. तत्काल ज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम बढ़ता है, ४. असंख्यात गुणी कर्म निर्जरा होती है । ५. हेयोपादेय रूप भेद - विज्ञान की सिद्धि । स्वाध्याय तप का फल - १. तत्त्व का अभ्यास २. वैराग्योत्पत्ति ३. धर्मप्रभावना ४. कुवादियों का मान मर्दन ५. स्वाध्याय ६. परम रसायन | सम्यक्ज्ञान ही धर्म्यध्यान पावारंभ- णिवित्ती पुण्णारंभे पउत्तिकरणं पि । णाणं धम्मज्झाणं जिणभणियं सव्वजीवाणं । । ९१ । । अन्वयार्थ - ( सव्वजीवाणं ) सब जीवों के लिए ( पावारंभणिवित्ती ) पापारंभ से निवृत्ति और ( पुण्णारंभे ) पुण्य कार्यों में ( पउत्तिकरणं पि) प्रवृत्ति कराने का हेतु भी ( णाणं ) ज्ञान ही है अतः ज्ञान को ही ( धम्मज्झाणं ) धर्म्यध्यान ( जिण भणियं ) जिनेन्द्र देव ने कहा है । अर्थ- जिनेन्द्र देव ने समस्त प्राणियों के लिए ज्ञान को ही धर्म्यध्यान कहा है; क्योंकि हिंसादि पाँच पापरूप आरंभ का त्याग व षट् आवश्यक रूप पुण्य कार्यों में प्रवृत्ति ज्ञान से ही होती है । स्व- पर तत्त्व का ज्ञाता स्वाध्याय करने वाला सम्यग्दृष्टि जीव ज्ञानी हैं। उस ज्ञान के फल से ज्ञानी के- १. सकल पदार्थ का बोध २. हित-अहित का बोध ३. भाव संवर ४. नवीन नवीन संवेग ५. मोक्षमार्ग में
SR No.090400
Book TitleRayansar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorSyadvatvati Mata
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages142
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, Ethics, & Religion
File Size3 MB
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