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________________ रत्नकरण्ड श्रावकाचार अर्थ - - श्रज्ञानरूपी अन्धकारके प्रसारको जिस तरहसे भी दूर करके जिनशासनके माहात्म्य को प्रकाशित करना प्रभावना है। १४८ प्रयोजन --- श्रेयोमार्गरूप रजत्रयका प्रधानभूत और सबसे प्रथम श्रश या रा सम्यग्दर्शन है उसके होनेपर दोनों ही अंश या रत्न - सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र अवश्य होते हैं। अतएव सम्यग्दर्शन के लिये प्रयत्न करना सबसे प्रथम आवश्यक है। जिनकी वह बात नहीं हुआ है उन्हें उसकी प्राप्ति- उत्पत्ति के लिये और जिनको वह प्राप्त होगया है उन्हें उसकी रक्षा-वृद्धि और सफल बनाने के लिये प्रयत्न करना चाहिये । सम्यग्दर्शनके आठ अंगों का यहांपर जो वर्णन किया है वे शरीर के आठ अंगोंके समान हैं। अतः शरीरके प्रत्येक अंगके समान ही सम्यग्दर्शनके प्रत्येक अंगका रक्षण आदि करना भावश्यक है। इनमें से पहले चार अगोंके द्वारा सम्यग्दर्शनरूप शरीरकी अतिचरणसे रखा होती है । उसके बाद उपगूहनादि तीन गोके द्वारा भी उसकी रक्षा तो होती है परन्तु साथ ही त्रिशुद्धि की वृद्धि और सफलताकी लन्त्रि भी होती हैं। इनमें से पहले सातों 'मोंसे सम्बन्धित विषय वहीं पर संभव हो सकते हैं जहाँपर कि सम्यग्दर्शनका सत्व है - जिनको सम्यग्दर्शन प्राप्त हैं । किंतु जिनको सम्यग्दर्शन प्राप्त ही नहीं हुआ है वहांपर क्या होना चाहिये या उसको क्या करना चाहिये इस सम्बन्धमें स्पष्टीकरणकी श्रावश्यकता है। इस अन्तिम प्रभावना श्रगका वर्णन उसी आवश्यकता को पूर्ण करता है । सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति व और पर दोनों में ही संभव है । मुमुक्षु भव्य प्राणीको सबसे प्रथम अपनी ही आत्मायें सम्यग्दर्शन को प्रकट करने का प्रयत्न करना चाहिये। किंतु यथाशक्य दुसरी आत्माओं में भी उसको प्रकाशित करनेका प्रयत्न करना चाहिये । श्रागम में अन्यत्र प्रभावना श्रगका स्वरूप बताते हुए जो उल्लेख किया गया है उससे अपने ही भीतर सम्यग्दर्शन को प्रकट करने के उपदेशकी मुख्यता स्पष्ट होती है। इसके सिवाय यह भी कहा गया है कि "श्रादहिर्द कादव्वं जइ सक्कइ परहिंदं च काव्यं । यदहिद पर हिदा - हो आदहिदं मुष्ठ कादव्वं ॥ " अर्थात् प्रथम तो आत्महित करना चाहिये । और फिर यदि हो मके तो परहित भी करना चाहिये । परंतु श्रात्महित और परहित इन दोनों में आत्महित अच्छी तरह करना चाहिये श्रतएव स्पष्ट है कि अपनी आत्मामें सम्यग्दर्शनको प्रकट करने के लिए सबसे प्रथम और सबसे अधिक प्रयत्न करना चाहिये । प्रकृत कारिकामें प्रभावनाका स्वरूप लिखा है उसमें भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि जिससे अपने में ही अथवा परसें ही उसको प्रकट करनेका इकतर्फा अर्थ किया जा सके। किंतु इसका अर्थ दोनों ही तरफ होता है। क्योंकि इसमें केवल इतना ही कहा गया है कि अज्ञान के प्रसार को हटाकर जिनशासन के माहात्म्य को प्रकट करना चाहिये। अतएव इससे माजुम होता है प्रभावनीयो रत्नश्यतेजसा सततमेव । नामः तपो जिन पूजाभियातिशयैश्च जिनवर्गः ॥ १
SR No.090398
Book TitleRatnakarand Shravakachar ki Bhasha Tika Ratnatray Chandrika Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKhubchand Shastri
PublisherDigambar Jain Samaj
Publication Year
Total Pages431
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size15 MB
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