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________________ प्राक्कथन.. मुनिकुज्जर समाधि सम्राट् आचार्य भगवन्त श्री १०८ आदिसागर जी महाराव (अंकलीक) वर्तम: शदी के सर्वमन्दी, निर्भीक महासन्त थे । आपने सभी अनुयोगों का अध्ययन कर उभयधर्म की महिमा व गरिमा को आत्मासात् किया । यतिधर्म का स्वयं आचरण कर शुद्ध मुनिचर्या का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन कराया ही है। साथ ही मुनिधर्म का साधक - हेतू श्रावक धर्म का भी परिशोधन करने का उपदेश दिया। श्रावकों का कर्त्तव्य क्या है ? उनका शुद्धाचरण किस प्रकार का हो, दोषों की शुद्धि का उपाय क्या है ? इत्यादि प्रश्नों का सरल, सुबोध समाधान किया है। सिद्धान्त है कि "कारणानुविधायिकार्यम्" जैसा कारण होता है वैसा ही कार्य होता है। श्रावक धर्म कारण है तो यति धर्म कार्य । अतः आपने साधन के परिशोधनार्थ यह "प्रायश्चित्त" ग्रन्थ स्वा है। इसमें श्रावक की चयाँ, कर्तव्य और कहि में प्रभाव-कषायवश होने वाले दोषों के परिशोधन का आगमोक्त सरल, सुस्पष्ट उपाय निरूपित किया है। श्रावक की प्रतिदिन की चर्या किस प्रकार की हो, उनके नित्य नियमकर्त्तव्यों का वर्णन भी बड़े ही सरल ढंग से समझाया है। जिनेन्द्र भक्ति का माहात्म्य, पंचामृताभिषेक की विशिष्ट महिमा का दिग्दर्शन कराया है। जिनाभिषेक और महामंत्र नमस्कार का सुगंधित पुष्पों से जाप अनेकों दोषों का परिहार कर देता है । अधिकांश अपराधों के शोधन का प्रायश्चित्त जिनपूजाभिषेक और गुरुभक्ति से ही होता है। श्रावक को ध्यान- धर्मध्यान व स्वाध्याय का भी विधान निरूपित किया है। आत्मोन्मुख होने का बीज श्रावक धर्म ही है। यहीं से ध्यान, अध्ययन, दोषों की परिशुद्धि का प्रयास, कष्ट सहिष्णुता, त्याग, तप, संयम का प्रारम्भ प्रयत्न शुरु होता है। इस ग्रन्थ के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मूल बीज धर्म का, मुक्तिपथ का श्रावकाचार ही है । प्रायश्चित विधान - २६ X
SR No.090385
Book TitlePrayaschitt Vidhan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAadisagar Aankalikar, Vishnukumar Chaudhari
PublisherAadisagar Aakanlinkar Vidyalaya
Publication Year
Total Pages140
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Ritual, & Vidhi
File Size3 MB
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