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________________ मैनाली परि प्रविणत्केवलज्ञानोपयोगीभूय विपरिणमते, ततोऽस्याक्रमसमाक्रान्त समस्त द्रव्यक्षेत्र कालभावतया समक्षसंवेदनालम्वनभूताः सर्वद्रव्यपर्यायाः प्रत्यक्षा एव भवन्ति ॥ २१ ॥ प्रवचनसारः 쿠션 या सर्वद्रव्यपर्यायाः प्रथमा बहु० । सोमः प्र एक ते तान हितीया बहुर। विजानादि विजानातिवर्तमान लट् अन्य पुरुष एक किया । उग्गहृपुचाहि किरिया अवग्रहपुर्वाभिः क्रियाभिः तृतीया बहु | निरुक्ति--जानाति इति था जानाति अनेन इति ज्ञानं विवासा किया। समास-व्याणि पर्यायाः सर्वद्रव्यपर्यायाः अवग्रहः पूर्व बागांना अवग्रहः ।। २२ ।। क्रिया [नॅव विजानाति ] नहीं जानता । तात्पर्य- केवली के ज्ञानमें सर्व सत् अपक्ष ज्ञेय हैं, वहाँ परोक्षविधि वाला ज्ञान होता ही नहीं है । Bag टीकार्य -- केवली भगवान इन्द्रियोंका ग्रालम्बन कर अवग्रह-हा-यत्राय पूर्वक क्रमसे नहीं जानता, किन्तु स्वयमेव समस्त आवरण के क्षपके अमें ही अनादि अनन्त अहेतुक और असाधारण ज्ञानस्वभावको हो कारणरूप से उपादान करके उसके ऊपर प्रवेश करने वाले केवलज्ञानोपयोगरूप होकर परिणमते हैं। इस कारण उनके समस्त द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका ग्रहण होनेसे प्रत्यक्ष ज्ञानके ग्रालम्बनभूत समस्त द्रव्य पर्याय प्रत्यक्ष ही हैं । प्रसंगविवरण- अनंतरपूर्व गाथा में बताया गया था कि अतीन्द्रियपना होनेसे शुद्धात्मा के शारीरिक सुख दुःख नहीं है । ग्रव इस गाथामें बताया गया है कि अतीन्द्रिय ज्ञानपरिणत होते से शुद्धात्मा ज्ञान में सर्व पदार्थ प्रत्यक्ष प्रतिभासित होते हैं । तथ्यप्रकाश -- ( १ ) प्रभुके ज्ञान में सर्व ज्ञात होनेका कारण इन्द्रियोंका आलम्बन न लेकर स्वयं सहज जानना है। (२) प्रभुका ज्ञान केवल अनादि अनन्त हेतु विज सहज ज्ञानस्वभावरूप आत्मा उपादान कारणका व्यक्तरूप है । ( ३ ) सहजज्ञानस्वभावपर केवलज्ञानोपयोगका प्रवेश होकर शुद्धात्मा अनंतकाल तक निरन्तर केवलज्ञान नामक स्वभावगुणव्यंजन पर्याय होता ही रहता है । ( ४ ) शुद्धात्मा के परिपूर्ण स्वच्छ केवलज्ञान में समस्त पदार्थ प्रमेयत्वगुणमय होनेसे एक ही साथ प्रतिबिम्बित ( प्रतिभासित) होते हैं । ( ५ ) शुद्धामार्क निरुपावि केवलज्ञान में अपनी सहज कलाके कारण आत्मप्रदेशों में सर्वज्ञेया शारचित्रित होनेसे सर्वद्रव्यपयय प्रत्यक्ष ही ज्ञात होते हैं । (६) केवलज्ञान होने का बीज अविकार स्वसंवेदन ज्ञान अर्थात् शुद्धोपयोग है । (७) पदार्थोकी एक साथ जानकारी न होकर कमसे कुछ जानकारी होनेका कारण ज्ञानको क्षायोपशमिकता थी वह कमजोरी भगवान नहीं रहीं। (८) ज्ञानावरण कर्मके निःशेष क्षय हो जानेके निमित्तसे उत्पन्न हुए केवलजानकी कला बेरोकटोक सर्वज्ञता में विलास करती है ।
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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