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________________ प्रवचनसारः २७ अथ शुद्धोपयोगजन्यस्य शुद्धात्मस्वभावलाभस्य कारकान्तरनिरपेक्षतयाऽत्यन्तमात्मायत्तत्त्वं द्योतयति-- तह सो लद्धसहावो सव्वण्हु सव्वलोगपदिमहिदो। भूदो सयमेवादा हवदि सयंभु त्ति णिदिट्टो ॥१६॥ शुद्ध चिद्भावदर्शी सर्वज्ञ समस्त लोकपतिपूजित । हुप्रा स्वयं यह प्रात्मा, अतः स्वयंभू कहा इसको ॥१६॥ तथा स लब्धस्वभावः सर्वज्ञः सर्वलोकपतिमहितः । भूतः स्वयमेवात्मा भवति स्वयम्भूरिति निर्दिष्ट: ।।१६।। अयं खल्वात्मा शुद्धोपयोगभावनानुभावप्रत्यस्तमितसमस्तघातिकर्मतया समुपलब्धशुद्धानन्तशक्तिचित्स्वभावः, शुद्धानन्तशक्तिज्ञायकस्वभावेन स्वतन्त्रत्वाद्गृहीतकर्तृत्वाधिकारः, शुद्धा नामसंज्ञ-तह त लद्धसहाव सव्वण्हु सबलोगपदिसहिदो भूद सयं अत्त सयंभु त्ति णिहिट्ट । धातुसंज्ञ-भव सत्तायां, मह पूजायां । प्रातिपदिक-तथा तत् लब्धस्वभाव सर्वज्ञ सर्वलोकपतिमहित भूत स्वयं को जिसने ऐसा । (२) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके स्वभावके कारण स्वयं ही प्राप्यपना होनेसे याने स्वयं ही प्राप्त होनेसे कर्मत्वका अनुभव करता हुआ । (३) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके स्वभावसे स्वयं ही साधकतम अर्थात् उत्कृष्ट साधन होनेसे करणपनाको धारण करता हुआ । (४) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके स्वभावके कारण स्वयं ही कर्म द्वारा समाश्रित होनेसे अर्थात् निजपरिणमन स्वयं को ही देने में आता होनेसे सम्प्रदानपनेको धारण करता हुया । (५) शुद्ध अनन्तशक्तिमय ज्ञानरूपमें परिणमित होनेके समय पूर्व में प्रवर्तमान विकलज्ञानस्वभावका नाश होनेपर भी सहज ज्ञानस्वभावसे स्वयं ही ध्र वताका अवलम्बन करनेसे अपादानपनेको धारण करता हुआ और (६ ) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके स्वभावका स्वयं ही आधार होनेसे अधिकरणपनेको आत्मसात् करता हुआ स्वयमेव छह कारकरूप होनेसे अथवा उत्पत्ति अपेक्षा से द्रव्य-भावभेदसे भिन्न धातिकर्मोंको दूर करके स्वयमेव आविर्भूत होनेसे 'स्वयंभू' कहलाता है। अतः निश्चयसे परके साथ आत्माका कारकताका सम्बन्ध नहीं है जिससे कि शुद्धात्मस्वभावलाभके लिये सामग्री खोजनेको व्यग्रतासे परतंत्र होना पड़े, फिर क्यों शुद्धात्मस्वभावको प्राप्तिके लिये बाह्य साधन ढूंढ़ने की व्यग्रतासे जीव व्यर्थ ही परतंत्र हुए जा रहे हैं। * प्रसङ्गविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें शुद्धोपयोगके लाभके अनन्तर इस शुद्धात्मस्व. भावलाभका अभिनन्दन किया गया था। अब इस गाथामें उसी शुद्धोपयोगजन्य शुद्धात्मस्वभावलाभकी पूर्ण निरपेक्षता व प्रात्माधीनताका वर्णन किया गया है । '' तथ्यप्रकाश--(१) शुद्धात्मस्वभावलाभ अर्थात् परमात्मत्वविकासको अन्य नहीं कर 20...
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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