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________________ प्रवचनसार-सप्तदशाङ्गो टोका ३७७ धिरोहतु मोक्षमार्ग द्रव्यं प्रतीत्य यदि वा चरणं प्रतीत्य ।।१२।। ॥२०॥ इति तत्त्वदीपिकायां प्रवचनगारवृत्ती श्रीमवमृतचन्द्रसूरि विरचितायां ज्ञयतन्त्रप्रज्ञापन्नानाम द्वितीयः श्रुतस्कन्ध: समाप्तः ॥ २॥ मार्ग: मार्ग अन्वेषणे चुरादि । समास- स्वस्य भावः स्वभावः तेन स्वभावेन ।। २०० ।। सिद्धान्त-(१) निर्विकार परिपूर्ण विकास पानेका उपाय अविकारस्वभावी सहज ज्ञानघन सहजात्मस्वरूपका पालम्बन है । दृष्टि-- १- पुरुषकारनय, अनीश्वरनय, शुद्धभावनापेक्ष शुद्ध द्रव्याथिकनय (१८३, १८६, २४ब)। प्रयोग-परमसहजानन्दधाम निर्वाणकी प्राप्तिके लिये परमात्माके गुणस्मरणपूर्वक ___ ज्ञानदर्शनप्रधान सहजात्माश्रमका प्राश्रय करके साम्यभावरूप परिणामना ।।२०।। mpassignmenawanprammar me इति पूज्य श्रीकुन्दकुन्दाचार्यप्रणीत प्रवचनसार पूज्य श्रीअमृतचंद्रजी सूरिकृत तत्त्वप्रदीपिका टोकापर ज्ञेयतत्त्वज्ञापन नामक द्वितीय स्कंधसे सम्बन्धित सहजानन्द सप्तदशाङ्गो टीका समाप्त । SHRIRAMAamme Histmailindimes
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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