SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 8
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ R AGHIBAHANE PARTAINMEANING शास्त्रों के समर्थशाता वृत्तिकार प्रवचन तत्त्व ज्ञानविकाशिनो टीका-वृत्ति यथार्थ नामवती है । तत्त्व पर प्रकाश अच्छी तरह से मला है। इति इतनी जिन सारोद्धारे। तो विशद एवं सरल है कि सामान्य वाचक भी ग्रन्थ के हार्द तक पहुंच सकता है। प्रवचन मटीके निकार शास्त्रों के समर्थ ज्ञाता है ऐसा वृत्ति के प्रवगाहन से निश्चित होता है। वृत्ति में प्रसंग प्रसंग पर का सार प्राते उद्धरणों की संख्या बहुत बडो है, ५०० से अधिक ! कतिपय स्थलों पर ग्रन्थों के नामों के साथ उद्धरण द्वितीयः प्रस्तावना उल्लिखित है, करीबन ६० से अधिक का नामोल्लेख किया है। कुछ स्थलों पर बिना ग्रन्थनाम उद्धरण दिये गये है। ऐसे उद्धरणों के मूलस्रोत की खोज भी हमने यथाशक्य को है एवं ऐसे मूलस्रोतों का उल्लेख उद्धरण के पीछे स्क्वेरकेट में दिया है। समी उद्धरणों को प्रकारादि क्रम से सूचि - प्राप्त मूलस्रोतों के साथ परिशिष्ट में दी है, जिस को देखने से खयाल प्रायेगा कि यत्तिकार महषि ने कहां कहां से शारत्रपाठ उद्धृत कर कर के एक साथ दे दिये हैं। श्रद्धा से हम उपकारी ग्रन्थकार के प्रति नतमस्तक हो जाएंगे। वृत्तिकार महर्षि समर्थ प्रतिभाशाली होने से मूलगत शब्दों के भाव को खुलकर, विशद रूप से, 'इदम् प्रत्र हुवयम् , अयं भाव:' कह कर खोलते है, जहाँ विशेष उहापोह की प्रावश्यकता होती है, वहां 'ननु' से शङ्कारल उठाकर, जमकर के उत्तर देते है। जिस स्थल पर मूल प्रादर्श के पाठ में शास्त्रीयता से विसंबाद दीखा, वहां कह दिया है उन्होंने कि 'यहाँ प्रादशं प्रति में यह पाठ है लेकिन यह ठीक जचता नहीं। यहां ऐसा पाठ होना चाहिए' यु कह कर उसको व्याल्या करते है । एवं स्वघ्याल्या को शास्त्राधारों से पुष्ट बनाते है द्रिष्टव्यः परमाणू रहरेणू ....द्वार २५४ गा. १३६१] जहां व्याख्या दो प्रकार की देखी जाती हैं वहां लिखते है, यहां हम अपने गुरुदेव पास जिस तरह समझे है, उस रूप से व्याख्या करते है । अन्य लोग दूसरे रूप से व्याख्या करते है। [द्रष्टव्यः मा. २, १५०, ५५, ६१९] 220120MPSTR000 RRIBE
SR No.090383
Book TitlePravachansaroddhar Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandrasuri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages740
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy