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________________ प्रमाणमीमांसा - ८९--सर्वे न तु स्पर्शनादीनां स्पर्शादिवत् प्रतिनियता एवार्था गृह्यन्तेऽनेनेति 'सर्वार्थग्रहणं मनः' 'अनिन्द्रियम्' इति 'नोइन्द्रियम्' इति चोच्यते । सर्वार्थं मन इत्युच्यमाने आत्मन्यपि प्रसंग इति करणत्वप्रतिपादनार्थं 'ग्रहणम्' इत्युक्तम् । आत्मा तु कर्तेति नातिव्याप्तिः, सर्वार्थग्रहणं च मनसः प्रसिद्धमेव । यत् वाचकमुख्यः श्रुतमनिन्द्रियस्य ।" [तत्त्वा• २. २२] श्रुतमिति हि विषयिणा विषयस्य निर्देशः । उपलक्षणं च श्रुतं मतेः तेन मतिश्रुतयोर्यो विषयः स मनसो विषय इत्यर्थः । “मतिश्रुतयोनिबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु" तत्त्वा० १.२७) इति वाचकवचनान्मतिश्रुतज्ञानयोः सर्वविषयत्वमिति मनसोऽपि सर्व विषयत्वं सिद्धम् । ९०-मनोऽपि पंचेन्द्रियवद् द्रव्यभावभेदात् द्विविधमेव । तत्र द्रव्यमनो मनस्त्वेन परिणतानि पुद्गलद्रव्याणि । भावमनस्तु तदावरणीयकर्मक्षयोपशमात्मा लब्धिरात्मनश्चार्थग्रहणोन्मुखो व्यापारविशेष इति ॥२४॥ ९१-नन्वत्यल्पमिदमुच्यते 'इन्द्रयमनो निमित्तः'इति। अन्यदपि हि चक्षुर्ज्ञानस्य निमित्तमर्थ आलोकश्चास्ति, यदाहुः-- "रूपालोकमनस्कारचक्षुभ्यः सम्प्रजायते । विज्ञानं मणिसूर्यांशुगोशकृद्भ्य इवानलः ॥" - ८९-जैसे स्पर्शनेन्द्रिय केकल स्पर्श को ग्रहण करती है. इसी प्रकार नियत पदार्थ हो जिसके द्वारा ग्रहण न किये जाएँ,किन्तु समस्त पदार्य ग्रहण किये जाएँ वह मन,अनिन्द्रिय और नोइन्द्रिय कहलाता है । 'सर्वार्थग्रहणं मनः' के बदले 'सर्वार्थं मनः' ऐसा कहा होता तो यह लक्षण आत्मा में भी चला जाता । 'ग्रहण' शब्द का ग्रहण करके यह सूचित किया गया है कि मन करण है। आत्मा कर्ता है, अतएव उसमें इस लक्षण का प्रसंग नहीं होता । मन सभी पदार्थों को जानने में करण होता है, यह प्रसिद्ध ही है। उमास्वाति ने कहा है-'श्रुतमनिन्द्रियस्य।' यहाँ विषयी के द्वारा विषय का निर्देश किया गया है । 'श्रुत' शब्द मतिज्ञान का उपलक्षण है । अभिप्राय यह हुआ कि मति और श्रुतज्ञान का जो विषय है वही मन का विषय है । 'मति श्रुतयोनिबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु' अर्थात् मतिज्ञान और श्रुतज्ञान सभी द्रव्यों को किन्तु उनको असम्पूर्ण पर्यायों को जानते हैं, इस कथन के अनुसार जब मति-श्रुतज्ञान सर्वविषयक हैं तो मन भी सर्वविषयक सिद्ध हुआ। ९०--पाँचों इन्द्रियों के समान मन भी दो प्रकार का है--द्रव्यमन और भावमन । मन रूप से परिणत हए पुदगलद्रव्यों को द्रव्यमन कहते हैं। मन को आवत करने वाले कर्म का क्षयोपशम होना लब्धि भावमन है और आत्मा का अर्थ ग्रहण की ओर होने वाला व्यापार उपयोगभावमन है ॥२४॥ ९१--शंका--आपने इन्द्रिय और मन को कारण बतलाकर अधूरे कारण बतलाए हैं। चाक्षुष ज्ञान में अर्थ और आलोक भी कारण होते हैं। कहा भी है--जैसे मणि, सूर्य किरण और छाने रूप अनेक कारणों से अग्नि उत्पन्न होती है उसी प्रकार रूप, आलोक, मन और नेत्र से ज्ञान
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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