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________________ प्रमाणमीमांसा १६७ वादिनः कथं साधुसाधनाज्ञानम्, तद्वचनेयत्ताज्ञानस्यवाभावा? । द्वितीयपक्षे तु न प्रतिवादिनो दूषणज्ञानमवतिष्ठते साधनाभासस्यानुद्भावनात् । तद्वचनाधिक्यदोषस्य ज्ञानात् दूषणज्ञोऽसाविति चेत; साधनाभासाज्ञानाददूषषणज्ञोऽपीति नैकान्ततो वादिनं जयेत्, तददोषोद्भावनलक्षणस्य पराजयस्यापि निवारयितुमशक्तेः । अथ वचनाधिक्यदोषोद्भावनादेव प्रतिवादिनो जयसिद्धौ साधनाभासोद्भावनमनर्थकम्; नन्वेवं साधनाभासानुद्भावनात्तस्य पराजयसिद्धौ वचनाधिक्योद्भावनं कथं जयाय प्रकल्पेत?। अथ वचनाधिक्यं साधनाभासं वोद्धावयतः प्रतिवादिनो जयः; कथमेवं साधर्म्यवचने वैधर्म्यवचनं वैधर्म्यवचने वा साधर्म्यवचनं पराजयाय प्रभवेत्? । कथं चैवं वादिप्र. तिवादिनोः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहवैययं न स्यात्, क्वचिदेकत्रापि पक्षे साधनसामर्थ्यज्ञानाज्ञानयोः सम्भवात्? न खलु शब्दादौ नित्यत्वस्यानित्यत्वस्य वा परीक्षायामेकस्य साधनसामर्थ्य ज्ञानमन्यस्य चाज्ञानं जयस्य पराजयस्य वा निबन्धनं न भवति । युगसाधन का प्रयोग करने वाले को करना है तो कसे कहा जा सकता है कि उसे सत्साधन का ज्ञान नहीं है ? उसे समीचीन साधन का ज्ञान तो है, केवल वचनों की इयत्ता (परिणाम) का ही ज्ञान नहीं है । अगर दूसरा पक्ष स्वीकार किया जाय तो प्रतिवादी के दूषणज्ञान की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वादी ने साधनाभास का प्रयोग किया था, किन्तु प्रतिवादी ने साधनाभास दोष का उभामन नहीं किया (सिर्फ वचनाधिक्य का ही उमावन किया।) शंका-वादी के वचनाधिक्य दोष को समझ लेने से यह सिद्ध होता है कि प्रतिवादी को दोष का ज्ञान है। समाधान-किन्तु वादी द्वारा प्रयुक्त साधनाभास का ज्ञान न होने से वह अदोषज्ञ भी तो है ! ऐसी स्थिति में वह वादो को एकान्ततः पराजित नहीं कर सकता। क्योंकि साधनाभास रूप दोष का उद्भावन न करने के कारण वह अपनी पराजय को रोक नहीं सकता। शंका-वचनाधिक्य दोष का उद्भावन करने से ही प्रतिवादी को विजय प्राप्त हो जाती है, अतएव साधनाभास का उद्भावन करना वृथा है । समाधान-तो साधनाभास का उद्भावन न करने के कारण प्रतिवादी का पराजय सिद्ध हो जाने पर वचनाधिक्य का उद्भावन करने से भी उसकी विजय कैसे हो सकती है ? शंका-वचनाधिक्य अथवा साधनाभास, इन दोनों में से किसी भी एक दोष का उदभावन करने से ही प्रतिवादी को विजय प्राप्त हो जाती है। समाधान-तो साधर्म्यवचन और वैधHवचन में से किसी एक का प्रयोग कर देने पर दूसरे के प्रयोग से वादी पराजित कैसे हो सकता है ? इसके अतिरिक्त, जय और पराजय का आधार यदि ज्ञान और अज्ञान ही माना जाए तो वादी और प्रतिवादी का पक्ष और प्रतिपक्ष का ग्रहण करना व्यर्थ हो जाएगा । साधन के सामर्थ्य का ज्ञान और अज्ञान तो किसी एक पक्ष में भी हो सकता है । शब्द आदि किसी एक पदार्थ को नित्यता-अनित्यता की परीक्षा में एक का साधन के सामर्थ्य का ज्ञान और दूसरे का एतद्विषयक अज्ञान जय-पराजय का कारण न होता हो, ऐसा तो है नहीं। यदि एक ही साथ
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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