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चाउरंगु वलु मिलिउ तुरंतु, हय गय रह जंपारण संतु । सिगिरि छात दीसहि अपारण, अंतरीख हुई चले विमाण ||४८२ ॥
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अँसी सयन चली अपमाण, वाजण लागे दरड निसारण |
घोडा खुररई उछली खेह, जागौ ताजे भादम्ब के मेह ॥४८६३ ॥ सेना के प्रस्थान के समय अपशकुन होना
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बाई दिसा करंकइ कागु वाट काटिगो कालो नागु । महुवरि दाहिणी अरु पडिहारु, दक्षणा दिस फेकरइ सियालु ॥४८ ४ || वरण मा दीसड़ जीव असंखि, धुजा पडइ तिन कैंसर पंखि ।
सारथि भरड कहै सतिभाउ, बूरे सगुन न दीजं पाउ || ४८५ ॥ तर केसव बोल तिस ठाह, सुगमु सुगराइ विवाहण जाइ ।
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सा सारथी समुझावें कोड, जो विहि लिख्यो सु मेटइ कोइ ॥ ४८६|| चालै सुहड न मानहि सवनु देखि सयनु प्रकुलाणे मय ।
माता रूपिरि घालि बिमारण, पाछइ आपण रचइ भार ||४८७ ॥
३. पाक मिले बहूत ( ग ) ४. ग ) ५. वाrs गाजर गुहिर
( ४८२) १. बलु ( क ग ) २. संपत्त (ग) सिखरित्र (कख) सिंगर छत्र नहीं परवा ( निसारण ( क ) ६. चढा (ग)
(४८३) १. गहिर ( ख ) गुहिर (ग) २. घोरा खुरद ( क) घोडा लक (ख) घोडा रज खुर (ग) ३. मूल पाठ लोडा ४. गरजइ (क) गाजे ( ख ग )
( ४८४) १. अरु परिहारु (फग) महिला सोही अरु प्रतिहारु कुकड़ वसि दिसा सीयालु ( ग ) मूलपाठ अंतु परिहारु
( ४८५) १. इन सकुणिह किउ दीजं पाउ (ग)
(४८६) १. सतिभाउ (ग) नोट- दूसरा तीसरा चरण ग प्रति में नहीं है। (४८७) १. र परारण ( क ) रचइ विमाणु (ख) मूलप्रति में 'च' पाठ है .: गन्तवहि मय बाहद्धि बुधि मारिण, माता रुपसि चडी बिमारिंग ।
चडि करि रथि वोलह महमहणं, चालक सूड न मानव ||