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________________ ( १८ ) चाउरंगु वलु मिलिउ तुरंतु, हय गय रह जंपारण संतु । सिगिरि छात दीसहि अपारण, अंतरीख हुई चले विमाण ||४८२ ॥ ५ १ अँसी सयन चली अपमाण, वाजण लागे दरड निसारण | घोडा खुररई उछली खेह, जागौ ताजे भादम्ब के मेह ॥४८६३ ॥ सेना के प्रस्थान के समय अपशकुन होना १ बाई दिसा करंकइ कागु वाट काटिगो कालो नागु । महुवरि दाहिणी अरु पडिहारु, दक्षणा दिस फेकरइ सियालु ॥४८ ४ || वरण मा दीसड़ जीव असंखि, धुजा पडइ तिन कैंसर पंखि । सारथि भरड कहै सतिभाउ, बूरे सगुन न दीजं पाउ || ४८५ ॥ तर केसव बोल तिस ठाह, सुगमु सुगराइ विवाहण जाइ । प सा सारथी समुझावें कोड, जो विहि लिख्यो सु मेटइ कोइ ॥ ४८६|| चालै सुहड न मानहि सवनु देखि सयनु प्रकुलाणे मय । माता रूपिरि घालि बिमारण, पाछइ आपण रचइ भार ||४८७ ॥ ३. पाक मिले बहूत ( ग ) ४. ग ) ५. वाrs गाजर गुहिर ( ४८२) १. बलु ( क ग ) २. संपत्त (ग) सिखरित्र (कख) सिंगर छत्र नहीं परवा ( निसारण ( क ) ६. चढा (ग) (४८३) १. गहिर ( ख ) गुहिर (ग) २. घोरा खुरद ( क) घोडा लक (ख) घोडा रज खुर (ग) ३. मूल पाठ लोडा ४. गरजइ (क) गाजे ( ख ग ) ( ४८४) १. अरु परिहारु (फग) महिला सोही अरु प्रतिहारु कुकड़ वसि दिसा सीयालु ( ग ) मूलपाठ अंतु परिहारु ( ४८५) १. इन सकुणिह किउ दीजं पाउ (ग) (४८६) १. सतिभाउ (ग) नोट- दूसरा तीसरा चरण ग प्रति में नहीं है। (४८७) १. र परारण ( क ) रचइ विमाणु (ख) मूलप्रति में 'च' पाठ है .: गन्तवहि मय बाहद्धि बुधि मारिण, माता रुपसि चडी बिमारिंग । चडि करि रथि वोलह महमहणं, चालक सूड न मानव ||
SR No.090362
Book TitlePradyumna Charit
Original Sutra AuthorSadharu Kavi
AuthorChainsukhdas Nyayatirth
PublisherKesharlal Bakshi Jaipur
Publication Year
Total Pages308
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size5 MB
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