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________________ ( ६४ ) प्रद्युम्न द्वारा भील का रूप धारण करना घणही कांड बिसाले हाथ, उतिरि मिल्यउ तिनि के साथ । पवरण वेग सो अागय गयउ, देइ पाखर परिण उभउ भयउ ।२६६। हउ वटवाल नारायण तरणउ, देइ दाण मुहि लागइ घरणज । चढ़ी वस्तु पापु मुहि जोगु, जइसे जाण देइ सवु लोगु ॥३००। । महलउ भणइ निसुरिण महु वयरगु, बडी वस्त तू मागइ कमूणु । अर्थ दई सोनो तू लेहि, हम बहु जाण अगहुडउ देइ ॥३०॥ भीलु रिसाइ देइ तब जाण, आइसी परि किम्व लाभइ जाण । भली वस्त जो तुम पह आई, मो मुहि आफि अगहुँडे जाहि ।३०२।। तउ महलउ जंपइ मुहि चाहि, एक कुम्वरि मोपह इह पाहि । हरिनंदरण कहु परणी जोइ, अरे सम्वर किम मांगइ सोइ १३०३। (२EE) १. पुरणही (क) अनही (ख; धनुष (ग) २. सजि करि सर ले हाथि (क) वाण विसाले हाथि (ख) कटारी विसाल हाथ (ग) ३.तिन कई (क) तिम्ह। ही (ख ग) ४. पुरिण उठि मिल्या (ग) ५. ले पाखत (क) बद पाखत (ख) धेह अविद्र तब ऊभा भया (ग) ६. तब (क) कुणि (ख) (३००) १. वस्त (क) वाण (ख) बस्तु (ग) २. जोगि (क) । लोग (ख) ३, जिउ हर (३०१) १. महिला (क ग) २. सुगहि (क) ३. मो (क) ४, प्ररप (क) प्ररथु (ख म) ५. दरखु (ख ग) देखि (क) ६. तं (क) ७. लेह (क) लोहि (ख) ८. प्रागे (क) अग्रहर (ख) वेगि जाप (ग) (३०२) १. भिल्ल (ख) २. पारण (क ख ग) ३. एसी (क) ४. बडो (ग) ५. माहि (क स) अइहे (ग) ६. लागह (क) प्रघउउउ (ख) मोह हम बेहु भिनु इम कहै (ग) (३०३) १. वाहि (ख) २. जो भो पहि (क) इह मो एहि (ख) यह मो पहि (ग) ३. सोह (ख) ४. सवर (क) समर (ख) नोट-तीसरा और चौथा चरण 'ग' प्रति में नहीं है।
SR No.090362
Book TitlePradyumna Charit
Original Sutra AuthorSadharu Kavi
AuthorChainsukhdas Nyayatirth
PublisherKesharlal Bakshi Jaipur
Publication Year
Total Pages308
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size5 MB
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