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________________ ( १३६ ) एहु चरितु जो वांचर को, सो नर स्वर्ग देवता होइ । ५ २ व धर्मे खप सो देव, मुकति व रंगरिंग मागई एम् ||६६७ || जो फुशि सुरपइ मनह धरिभाउ, असुभ कर्म ते दूरि हि जाइ । बोर वखाइ माणुसु कवर, तहि कहु तूसइ देव परदवतु ॥ ६६८ || अरु लिखि जो लिखियावइ साधु, सो सुर होइ महागुराराधु । जोर पढाइ गुण किउ लिउ, सो नर पावइ कंचरण भलउ || ६६६|| (६६७) १. हलुव कर्पु तुरिए होइ सो वरेड (ख) २. पावड एच (क) क प्रति में तथा ग प्रति में यह छन्द नहीं है (६६१ ) के प्रति में उक्त छन्द के स्थान पर निम्न छन् हैंपहि गुराहि जे चित्तह पर लिहहि लिहावइ जे मुखि कर । सुरइ सुगाव भब्बह लोय, सिंह कउ पुत्र परापति होइ ॥ ७० ख प्रति कु फुरिण सुरषद मनह परि जाउ, जो खासा मासु कम | तिस कह तूसह सइ देउ परव ""॥७११॥ हुनर महं साद | रु लिखि जोर लिखावइ सुट, सो सुरु होई महागुरिय जोरू पढाव गुण कड निल, सो नह पावह संजमु भलउ ॥७१२॥ एहु चरितुह पुत्र भडार, जो नरु पढ तहि परववरण तू सि फल वेह संपति पुत्र प्रवय जसु होइ ।। ७१३॥ हड बुषि ही न जाउ भेज, प्रखर मातह सुखिउ नभेउ । पंडित जगह नवच कर जोजि, होरा अधिक जिन लाव लोडि ।।७१४ ॥ इति प्रद्युम्न चरित्रं समाप्तं । श्लोक संख्या १२०० / शुभमस्तु प्रति- I हव होगा बुद्धि न जागर फेव श्रखित मंतु सु मुनिवर भेज पंडित जन विज कर जोडि अधिक होतु जिन लावह खोडि ||७१२॥ मह स्वामी का कौया यखाणु, पंडित जन मति होहु सुजाण । केवल उपजइ गुरण संतु, मुरहू भावगड उपज पुन्तु ॥७१३ ॥ इति परवव उपई समाप्त ॥ .
SR No.090362
Book TitlePradyumna Charit
Original Sutra AuthorSadharu Kavi
AuthorChainsukhdas Nyayatirth
PublisherKesharlal Bakshi Jaipur
Publication Year
Total Pages308
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size5 MB
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