________________
( १२४ रुक्मिणि के दत का कुंडलपुर नगर को प्रस्थान सो कुडलपुर गयो तुरंत, रूपचंदस्यो कह्यो निरुत्त । स्वामी बात सुगमो मो तशी, ह्उ तुम पह पठयो रूपिणी ॥६२३॥
संवकुम्वारु कुवर परदवणु, तिहि पवरिसु जाणइ सवु कवरगु ! जइसे तुम स्यो वाढइ नेहु, दुहु कुमार काहु वेटी देहु ।।६२४॥ रूपचन्दु वोलइ तिस ठाइ, रूपिणि कहु तू लेइ मनाई । जादौ वंस पूत जो होइ, तिसको वाहुरि धीयको देइ ॥६२५॥ कहइ वात जगावउ समुझाइ, इत्वही कहहि रुकुमिणी जाइ । साभाड तई जुपवाडउ कियउ. वात कहत नहु दूलित हिय उ ॥६२६।। जिणि परिगहु धालियउ अवटाई, सेसपाल तू गई मराइ । अजहु वयण कहइ तू एहु, मयणकुवर कह बेटी देहु ॥६२७॥
--
-
-
---
-
-
-
-
(६२३) निरस (क) - नोट - प्रथम और द्वितीय चरण म प्रति में नहीं है । मूलपाठ तुरंत ।
(६२४) १. उर (क) . बाधा (क) ३. देह (क) र (ग) कुवरनो (ग)।
(६२५) १. राइ ( क ) २. कउ त उ बेटी तहु ( क ) स्वउतू कहह बुला। ३, मूल प्रति में--पूजो सोई पाठ है। ४. तिस कहु धोयन देई कोइ (ग)
(६२६) १, जनसिउ ( क ) जगणिउ ( ख ) इहि (ग) २. तू तिरहस्य जाइ (ग) ३. सांभलि (क ख ) संभल करियह म्हारा किया (ग ४. नाटइ (ग)
(६२७) तू गई मराइ (ख) मूलपाठ-तू चल्यो मरवाइ २. महि ( ३. कह (ग) मूलपाठ तू