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मोहिनी विद्या को उठा लेने से
सेना का उठ खडा होना तव मयणधइ छाड्यो मोहु, मोहिणि जाइ उतारयो मोहु । सैन उठी बहु सादु समुदु, जाणौ उपनउ उथल्य उ समुद्र ||५५७:: पांडो उठे सुहड वरवीर, हलहुलु दस दिसा घर धीर | छपन काटि जादव बलिवंड, छत्री सयल उठे परचंड ।।५५८॥ हय गय रहवर अरु जंपारण, उटे जिहि सल पडे विमाण । सिगिरि छत्र जे पुहमि अपार, उठि सयन कवि कहिउ सधार ।।५५६।। प्रद्युम्न के श्रागमन पर भानन्दोत्सब का प्रारम्भ
धवल छन्द मयण कुवरू जब दीठउ आनंदिउ हरि राउ। लइ उछंगि सिर चुमियउ, भयउ निसारण ह घाउ ।। भयउ निसाणा घाउ, राय जादम मन भायउ ।
सफल जन्म भउ अाजु, जेमि कंद्रपु घर आयउ । सहुंकारु भयंत देव, जणु परियण तुठउ । मन आनंदिउ राउ, नयण जल कंद्रप वयठउ ।।५६०11
(५५७) १. भयर सज छोडई को (ख) २. भएज सट्ठ समझ, (ख) सेन्या उहि खड़े अरु सूतु (ग) ३. जग्न सु उछलिउ पलय समृद्द (स्त्र) जाग्या बलु वोथल्या समुदु (ग) मूलप्रति में 'समुद्र' पाठ है । . (५५८) १. पंडव (ख ग)
(५५६) १. जंपण (ख) झपारण (ग) २. 8 मयगल प्रवककि क्याण (ग) ३. विभाग (ख)
(५६०) थलु (मूल प्रति) बोहा (ख) धवस वंधों के (ग) १. पानामा (ग)