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________________ . (१०२) गीधोरणी स्याउ करइ पुकार, जनु जमराय जरणावाह सार । वेगि चलहु सापडी रसोइ, असई प्राइ जिम तिपत होइ ।।५०५।।।। __ श्रीकृष्ण का क्रोधित होकर युद्ध करना तउ महमहनु कोपि रथ चलइ, जनु गिरिवर पञ्चउ खर हडइ | हालइ महियलु सलकिउ सेस, जम संग्राम चलिउ हरि केसु ।।५०६॥ युद्ध भूमि में रथ बढाने पर शुभ शकुन होना जव रण पेलिउ रथु आपनउ, तव फरकिउ लोयणु दाहिउ। अरू दाहिणइ अंगु तसु करइ, सारथि निसुणि कहा सुभु करइ ॥५०७।। सारथि एवं श्रीकृष्ण में शतीलाप रण संग्राम सयनु सवु जिरणी, अरू इहि प्राइ हडी रुक्मिणी। तउ न उपजइ कोप सरीर, कारण कहा कहइ रणधीर ।।५०८।। तखरण सारथि लागो कहण, कवरण अचंभउ यह महमहण । भाजहि सुहड हाक तुह तणी, अरु तो हाथ चढइ रुक्मिगी ॥५.०६।। - - (५०५) १. वापिरिण (ख) गीदउ (4) २. स्याल (ग) ३. ते (ग) ४. संपन (ख) ५. स्याहु प्राय जिस ति ते होइ (ख) पंसी पसुबन रह्हन कोइ (ग) (५०६) १, कोपि सुडि (ख) कोपि रणि (ग) २. खडहडइ (ख) पर्वत थर हरभो (ग) ३. सकिउ (ख) बोल (ग) ४. चढिउ (ख) चल सुरणि जावमह नरेसु (ग) (५०७) दोठी सयन पड़ी घर ताम कोपारद विस भज ताम । तंरिग हाथ लइकर चाउ, प्रारिमरण वल भानउ भड़िवाउ ॥ यह इन्च मूलप्रति में नहीं है । (५०६) १. सुहड (ग) ३. तीसरा चरण 'ल' प्रति में नहीं हैं मुलपति में। 'फुधर पाठ है।
SR No.090362
Book TitlePradyumna Charit
Original Sutra AuthorSadharu Kavi
AuthorChainsukhdas Nyayatirth
PublisherKesharlal Bakshi Jaipur
Publication Year
Total Pages308
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size5 MB
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