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________________ सत्तचालीसमो संधि दिन व्यतीत हो गये । इसी बीच में किसीने जाकर स्त्री-लोलुप वर अंगारकसे यह कह दिया कि “हे देवदेव ! तुम्हारी अभिलषित सीनी कन्याएँ बनमें चली गई है। तुम उनको खोज लो और फिर बार-बार उनसे संतुष्ट होओ।" यह सुनकर अंगारक एकदम आगबबूला हो उठा, मानो किसीने आगमें सौं बार घी डाल दिया हो । उसने यह निश्चय कर लिया कि आज मैं अवश्य उन लड़कियों का घमण्ड चूर-चूर कर दूंगा जिससे न तो दे मेरी हो सके और. न किसी दूसरेको । अत्यन्त निष्ठुर वाह, क्रोधसे भरा हुआ दौड़ा, और उस वनमें आग लगा आया | धक धक करके आग चलने लगी और शीघ्र दुष्टजनके वचनोंको भाँति भड़क उठी ।।१-६।। [६] सूखे तिनकोंकी वह पहली आग उसी प्रकार फैलने लगी जिस प्रकार निर्थनके शरीरमें क्लेश फैलने लगता है । ज्वालमाला से वह समूचा वन उसी प्रकार प्रदीम हो उठा जिस प्रकार रामका हृदय ( सीता के वियोगमें ) संतप्त हो रहा था। कहीं पर सूखे तिनकोंका ढेर जल रहा था, कहीं पर वनचरोंके जोड़े नष्ट हो रहे थे। कहींपर वे अपने बच्चोंसे हीन होनेके कारण चिल्ला रहे थे। संसारसे भीत भावकाकी भौति वे उन मुनिवरोंकी शरण में चले गये। इस अवसरपर आकाशमार्गसे जाते हुए हनुमानने ( उस आगको देखकर ) अपना विमान रोक लिया । वह अपने मनमें सोच रहा था कि 'मर मर' यह आग किसने लगा दी । मुझे अपना जाना स्थगित करके गुरुको सेवा करनी चाहिए। क्योंकि (नीतिविदोंका कथन है कि) शरणागतका आना, बंदीको पकड़ना, स्वामीका कार्य और मित्रका परिमह, इन कठिन प्रसंगामें जी जूझता नहीं वह शत-शत जन्मोंमें भी शुद्ध नहीं हो सकता ॥१६॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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