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________________ पञ्चालीम संधि | 1 भरे घड़े रखे थे । वहीं मिठाई की दुकानों पर 'कन कन' शब्द हो रहा था, मानो प्रियों से मुक्त स्त्रियाँ ही कुन मुना रही हों। नई मिठाइयों अन्यंत उजले रंग की थीं, जो उत्तम वेश्याओंके समान बाहरसे मीठी थीं। कहीं पर तंबोलीकी दुकान थी जो मुनिवरकी मतिकी तरह मध्यस्थ ( तटस्थ और बीचोंबीच ( स्थित ) थी, अथवा अर्थ-बहुल देव महिला थी जो लोगोंका मुख उजला ( उज्ज्वल करने, रंगने) करने में समर्थ थी । कहीं जुए के पांसे पई हुए थे, जो नाट्यगृह और तमाशे के समान थे कहीं पर मुनिवरों के समान जिनेन्द्र का नाम लिया जा रहा था और कहीं पर बंदीजन के समान अपना दाय ( दांव, दाय) मांगा जा रहा था। कहीं कहीं पर उत्तम मालाओंकी दुकानें थीं मानो सूत्र और अर्थवाली व्याकरणको पुस्तक हों । कहीं-कही सुदर स्वच्छ तारक थे जो खलजनोंके शब्दोंकी तरह खारे थे। कहीं तेलसे मिले हुए घी थे मानो असमान खोटे मित्र हो । कहीं पर नरों के मान को उन्नमित किया जा रहा है, मानो आयुप्रमाण वाले यमदूत हों। कहीं पर मदमुक्त कामनियाँ थी तो कहीं अधिक रेखाओं वाली वृद्धाएँ। इस तरह समस्त नगर को देखता हुआ, मोतियों की रंगीली को चूर-चूर करता हुआ पवनपुत्र हनुमान लीलापूर्वक यहां प्रविष्ट हुआ जहाँ राम, लक्ष्मण और सुग्रीव थे । उनमें हाथ जोड़े हुए हनुमान ऐसा लग रहा था मानो काल, यम और शनिमें चौथा कृतान्त आ मिला हो ।।१- १७ ।। ५६ १३] रामने उसे अपने आधे आमनपर बैठाया। वह भी जिनवर शागत में मुनिवर की तरह निश्चल होकर उस पर बैठ
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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