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पउमचरित एस्वन्तरें सिर लाइय करे। जोकारिउ बलु विजाहरेहिं ॥२॥ जगै जिणवर-भवण जाई जाई । परिधि मधि साइसाई ।।३।। पञ्जहु पढीवउ सुहर-पया । जिविसेण पतुः किकिन्ध-णयरु ॥४॥ प्रतिय कियई साहसई जइ वि । सुग्गीवहाँ मणे संदेहु सो वि ॥५॥ भहाँ जम्वत्र पारेउ महन्तु कासु । किं वययणही कि लक्खणासु ॥६॥ कहलासु तुलिउ एके पचण्डु । अण्णेथे पुणु पाहाण - खण्ड ।।७।। वडारड साहसु विहि मि कवणु । किं सुहगई किं संसार-गमणु॥८॥ जम्बवेण वुतु 'मा मणेण मुज्छु । किं भज्ज वि पडु सन्देहु तुम्छु ।।६॥
बहारउ वहन्तरेण परमागमु सम्बहों पासिर । जम्म-सए बि गरराहिया कि सुबह मुणिवर-भासिउ' ॥१०॥
[२] तं णिसुण धि सुग्गीवहीं हरिसिय • गत्तहो ।
फिट्ट भरित जिण-वयणे हि जिह मिच्छत्तहो ॥११॥ आगम - वलण उपलबएण । अनलोइड सेपणु कइद्धएण ॥२॥ 'किं को धि अखि एत्तिय माझे। जो खन्धु समोइ गरुम-चोझ ॥३॥ जो उज्जालइ महु तणउ वयागु । जो दरिसइ वसहाँ कलत्त-रग्रणु ।।५।। जो तारइ दुक्ख • महापई है। जो जाइ गसड़ जाणई हैं ॥५॥ तं णिसुवि जम्बर बघिउ एवं । 'हणुवन्तु मुवि को जाइ देव ॥६॥ णड जागहुँ कि आरुटु सो वि । जं णिहउ सम्मु खर दूसणो वि ॥७॥ संसेसु धरधि माझार - तणुउ । रात्रणहाँ मिलेसह णवर हणुड ॥८॥ जं जाणही चिन्तहाँ त पएस । तें मिलिए मिलियर जगु असेसु ॥६॥