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________________ पउभचरित वेणि त्रि वियष्टुपणय- वस्छयल । वैणि वि पफुखिय-मुह कमल ॥ घत्ता सयल वि सोहइ सुग्गीव तर जं वोहि अवमाणियउ । महु विहिए कुल-बहुआएँ जिह खल्लु पर-पुरिसु ा जाणियड' ॥६॥ [१ ] मणु धौरवि सुग्गीवहाँ तणज । अवलोइड अणुहरु अपणा ॥१॥ सुकलतु जेम सुपणामि [य] उ । सुकलत्तु जेम आयामियउ ॥२॥ सुकलत जेम दिद-गुण-घणउ । सुकलतु जेम कोडावणउ ॥३॥ सुकलन जेम णिचूट - भरू । मुकलसु जैम पर • णिप्पसरु ॥४॥ सुकलतु जम सइवरे गहिउ । घर जणयहाँ जणय सुभएँ साहिट ||५|| तं अनावत हत्ये बहिउ । अफालिड दिसहिं णाई रहिउ ॥६॥ णं काले पलय-काले हसिड । णं जुबखाएँ सायरेण रसिउ ॥७॥ णं परिय चक खखक-यलें । भई कम्पिय विद्यसुग्गीच-बलें ॥८॥ घसा तं भासणु चाक्सद्दु -सुर्णेवि केलि च बाएं धरहरिय । पर-पुरिसु रमेपिणु असइ जिह विज सरीरहें पासरिय ।।६।। [ ८] मायासुट दिसालियरें । मेझिउ विजए यालियएँ ॥६॥ णं णिन्दणु मुछ विलासिणिएँ । वर - मयलम्बशु रोहिणिएँ ॥२॥ णं सुरवड परिसेसिउ सहर । * राहर सीय - महासइए ॥३॥ मरण-राउ मेलिउ रहएँ । पाव-पिण्डु सासय-गह ॥४॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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