SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 250
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २४२ पबमचरित सुग्गीरयशुम्जोविनाई। विहि विणि विमाणाई दोहगाई।। घत्ता धन्दिण-जण-अय - जयकारण सपखण - रामारूव किह । सुर-परिमिय-पवर-विमाणहि वेणि वि इन्द-पदिन्द जिहा [५] . अणेक - पासे किय सारि - सम्म । सुविसाला सुघण्टा-सुवाल-गेज ॥१॥ अलि - मारिय गय - घर पयड । विहलारू णिम्भर-मय-विसष्ट ।।२।। सिन्दूर - पङ्क - पश्यि - सरीर । सिकार - फार- गजण - गहीर ॥३॥ उम्मेह गिरस जाइ थाह । महस्ति भणोहर बेस पाई ॥४॥ अण्णेक - पासे रह रहिम - थट्ट । चुरन्त परोपफरू पहें पबह ॥५|| स-तुरङ्ग ससारहि स-कचिन्ध । णाणाबिह-वर- पहरण- समि ॥६॥ श्रणेछ - पास बल · दरिसगाई। जन्त - सूर - सर - मीरयाई ॥७॥ 'आयडिय - चाव - महासराई । उग्गामिय-भामिय - असिवराई ।। घत्ता श्रणेपासें हिंसन्तड हपवर साहणु णीसरह। . - सुकलत्तु जेम्ब मुकुलोणउ पय-संचारु ण वीसरइ ॥६॥ [६] मण्णेक्ोत्तर अण्णेय वीर । गजन्ति समर - संघष्ट - धीर ॥१॥ एक्केण वुन 'सोसमि समुद्हु' । अण्णेवक मणइ 'महु णिसियरिन्दु ॥२॥ अण्णोक्कु भगइ 'हउँ धरमि सेफ्णु' । अमरकु भणइ 'महु कुम्भयण्णु ॥३॥ अण्णेशकु भणइ 'महु मेहणा' । अण्णेशकुममा 'महुभव-णिहाउ ॥५॥ भण्णेक्कु भणह 'भो णिसुणि मित्त ! हउँ चलहों स-इत्थं पेमि कम्त' ॥५॥ अक्कु भगह "किं गजिषण ! भज वि सलाम - विस्मिएम ॥५॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy