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________________ २२२ पउमचरिउ * ] [ | 'माइ मण श्राणन्दयर यि कुल ससि अ-कलङ्क | जाणइ जाणिय सयछ : जाँ कह भय-भीएं सु ॥१॥ अणु वि दहवयणु मणेण मुणे णामेण वोहि अणुवेक्ख सुर्णे ॥२॥ चिन्तेव्वउ जीव रप्ति-दिणु । " भव भव महु सामिड परम-जिणु ॥ ३॥ भ भ लभ समाहि-मरणु । भव भवें होउ मुम्बइ-गमणु ॥४॥ सण णाणेण सहुँ ||९|| म भभत्र जिण गुण सम्पत्ति महु | भनेँ भने भने मर्ने सम्मत होउ श स भ 10 महन्त दिह्नि । भव भवें उप्पज्जउ धम्म-निहि" ॥७॥ भव भव सम्भव अणुत्रेस्ट रावण एयाउ । जिण सासण बारह- भैयाउ ||८|| जो पढइ सुणइ म सहहह । सो सासय सांबख सयदें लहई' ॥ ६॥ · . - घत्ता सुन्दर वयणाई लभाई मणे सरहों । स हूँ भु व जुचलेण क्रिउ जयकार जिणेसर हों ॥१०॥ ५५ पञ्चवण्णासमो संधि 1 'एक दुलह धम्मु एस विरहग्गि गरूषत । आयहँ कवणु लमि' दहवयणु दुतक्खीहू ॥ [+] 'एस जिनवर चयणुण खुक्क । एत्तहँ यम्महु वम्महों एतहँ भव-संसार बिरुव । एव विरह- परवसिंहूअ का ॥१॥ ||२॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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