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सिवण्णासमो संधि करतलमें ऐसे लगी मानो सुकांता अपने कांतसे ही जा लगी हो । तब उसने मुद्गर मारा, हनुमानने उसके भी सौ टुकड़े कर दिये । तब निशाचरने यह चक्र छाड़ा, जो सैकड़ों युद्धोंमें अजेय था। अत्यन्त हर्षित हनुमानको वह कहीं भी नहीं लगा वैसे ही जैसे दुर्जनके वचन सजनको नहीं लगते। इन्द्रजीत जो-जो अस्त्र छोड़ता, वह सौ-सौ टुकड़ों में हो जाता। रावणपुत्रके अंत में निरल होनपर रामके दूत हनुमानने विलासपूर्वक हँसते हुए कहा-"अच्छा हुआ जो तुम मुझसे लड़े, प्रहार करो, मानो उपवासोंसे भग्न हो गये हो ?" उसके वचनोंसे इन्द्रजीत शीघ्र भड़क उठा मानो आगमें धी पड़ गया हो ।।१-१०||
[१२] उसने कहा, "मर-मर, युद्धमें इस तरह व्यर्थ बारसगरमा गा; नरनिन हावी मने प्रवर सिंहसे क्या । बिना विषके विशाल सर्पसे क्या, बिना दौतके हाथीसे क्या, विना सद्भाबके नहसे क्या, आकाशमै निर्जल मेघसे क्या, धूर्तजनांके बीच दुर्विदग्ध से क्या. कुपुरुषसमूहके द्वारा किसी बातके अहणसे क्या, यदि प्रहार कर तो एक हो आघातमें मार डालू परन्तु तुम दृत हो इसलिए विदीर्ण नहीं करता।' यह कहकर उसने भुवनम यशस्वी हनुमानके ऊपर नागपाश फका । इसी अवसरपर हनुमानने अपने मनमें सोचा कि मैं कितना और शत्रुसंहार करु । तो उचित यही है कि मैं अपने आपको बँधवा हूं। जिससे रावणके साथ बातचीत कर सकें ।" यह विचारकर उसने आते हुए उस नागपाशका सगे भाईकी तरह आलिङ्गन कर लिया । रणरससे भरपूर कुशल हनुमानने कौशलपूर्वक अपने आपको विरवा लिया ॥१-१०||