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________________ १६८ पउमचरिउ घत्ता विलिय-पहरणु णासन्तु णिऍवि णिय - साहणु । रहवर वाहवि विड़ अग्गएँ तोयदवाहणु ॥१०॥ [ ] रावण राम-किका रण भयभरा भिडिय विप्फुरन्त।। विडसुग्गीवाहवा विजय-लाहवा गाई 'इणु' भणन्ता ॥ ॥ वे वि पयण्ट चे वि विनाहर । वेष्णि वि अस्वय-तोण धणुधर ॥२॥ वेणि वि वियत-वच्छ पुलइय-भुभ । वेण्णि वि भजण-मन्दोयरि सुभ ॥३॥ वेषिण वि पक्षण-इसाणण-जन्दण । वेति यि दुहम - दाणव- महण ॥४॥ वेणि वि पर • वल-पहरण-पहिय ! वेणि वि जय-सिरि-बहु-अवरुण्डिय॥५॥ वेणि वि राहव-रावण- पक्खिय । चेणि वि सुरवहु-णयण कवक्सिया॥६॥ वेणि वि समर-साहि जसवन्ता । वेणि वि पहु-सम्माणु सरन्ता ॥७॥ वेणि वि परम-जिणिन्दहाँ भत्ता । वेणि वि धीर दार भय - चत्ता HIt वेणि वि अतुल महल रग दुद्धर । वेणि वि रस्स-णेस फुरियाहर ॥६॥ घत्ता विहि मि महाहवु जो असुर-सुरेन्दं हि दोसइ । रावण - रामहें सो तेहउ दुकरु होसइ ॥१०॥ अमरिस-कुद्धरण जस-लुद्धएण जयसिरि-पसाहणेणं । पेसिय विश हणुवहो महवाही मेहवाहणेणं ॥१॥ 'गम्पिणु णिणय-परचम दरिसहि । जिह सइ तिह उप्परि परिसहि ॥२॥ तं णिसुणेप्पिणु विम चियम्भिय ! माया - पाउस - लोलारम्भिय ॥३॥ कहि जि मेह-दुग्गयं । सुराउहं समुग्गयं ॥४॥ कहिं जि विग्जु-गज्जियं । धणेहि कं विसज्जियं ॥५॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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