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________________ १६० पउमचरित सो हणुवहाँ मिरिउ पलम्व-बाहु ! गङ्गा-बाही अडण बाहु ॥५॥ जो तेण पर्मेल्लिज लडडि-दण्ड । सो भवि गढ सय खण्ड-खप्यु ! सिरिसइलु वि पहलिउ पुलइया । ३. मगहों पीपा पुह II ::ll दरिसावमि' एम चवन्तरण । उम्मूलिड तालु तुरन्तएण III कु-जणु च सुर-भायणु थङ्ग-भाउ । दूर-हलड भन्णु वि दुष्पणाउ | घत्ता तेण णिसायरू आहयणे आयामेषि समाहड तालें । पडिउ धुलेप्पिणु धणियल घाइड देसु णाई दुकाः ॥१०॥ [६] .. दुबई जं हणवण णिहर समरगण दाठावलि स-मच्छरो। धाइज एकदन्तु गलगजे विणं गयबरही गपत्ररो ॥३॥ जो पुण्ण-बार वण-रक्सवाल । संपाइल णं खय-कालें कालु. 11२।। दिद-काठण-देहु थिर-थोर-हत्थु । पर-वल-पोलि- भेल्लय- समथु ॥३।। आयाम वि सति पमुक तेण । शं सरि सायरहों महाहरेण ।।३॥ सा सामीरणिहूँ परायणस्थ । असइ व सप्पुरिसहाँ श्रकियस्थ 114।। हणुवेण वि रणउहें दुणिरिक्खु । उपाहिउ घर-साहारु रुक्व ।।६।। कामिणि-मुह-कुहरहाँ अणुहरन्तु 1 परिपक - फलाहरु कुसुम-दन्तु ॥७॥ णव - पल्लव - जीहा - लवलवन्तु । कलयण्ठि - कण्ठ • महुरुजवन्तु ।।८।। यहकम्त्र - वियाह व दल-णिवेसु । पच्छष्ण - परिट्टिय- रसविसेसु ॥६
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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