SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 146
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १३८ पउमचरिड । [२] अण्णु वि मयरहराबत्त-धरु सिर-सिहर-चढाविय-उभय-करु । णिय जणि वि पुच ण अणुसरइ सोमिति जेम पई संभरइ ॥१॥ ( पद्धडिया-दुवई) सुमरह णिय गन्दणु माया इस सुमरइ सिहि पाउस छाया इव ॥२।। सुमरइ जणु पहु-मजाया इव ॥३॥ सुझाव भिन्नु शुसाभिदा । सुमरह करहु करार-लया इव ॥४॥ सुमरह मन-हस्थि घणराह व । सुमरइ मुणिवरु गइ-पेवरा इव ॥५॥ मुमरह णिन्द्णु थण-सम्पत्ति च । सुमरइ सुरवर अम्मुप्पत्ति व ॥६॥ सुमरह भविउ जिणेसर-मति छ । सुमरइ वड्याकरणु विहन्ति व १७॥ सुमरइ ससि संपुण्ण पहा इव । सुमरइ बुहयणु सुका-कहा इव II सिह पइँ सुमरइ देवि जणझणु । रामहों पासिउ सो वृमिय-मण ६॥ घसा एक्कु तुहारउ परम-दुहु अगेक्कु वि रह-तणयहाँ तणउ । एक्कु रत्ति अण्णेषकु दिणु सोमित्तिहँ सोक्नु कहि तणड' ॥३०॥ तो गुण-सलिल-महाणइहें रोमञ्च पवहिर जाणा । काउ फु वि संय-खण्ड गउ पं खलु भलहन्तु विसिह-मड | (पद्धडिया-दुवई) पदम् सरीरु ताह रोमचिउ । पच्छएँ णवर विसाएँ सचिउ ॥२॥ 'दुक्कर राम-दूउ एहु आइउ । मम्छुड अण्णु को वि संपाइस ॥३॥ अस्थि अपोय पुरथु . विजाहर । जे णाणाविह · रूव-अधार ॥३॥ सवाँ मई सब्भाव णिरिक्खिय । चम्दणहि वि चिरुणाहि परिक्खिय ।। गं घण-देवय माणहाँ चुक्की । "मई परिणहाँ"पभणन्ति पटुकी ६॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy