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________________ १२६ पडमचरित स-पओहर पाउस-सोहा इव 1 अविचल सर्वसह वसुहा इव ॥५॥ कन्ति-समुबल तढि-माला इव । सब-सलोण उवहि-बेला इव ॥६॥ णिम्मल कित्ति व रामहों केरी । सिहुअणु भौषि परिद्विय सेरी ॥७॥ यत्ता अट्टारह मुबह-सहासह सीयह पासु समलियई। ण सरवर सियह णिसणई स्यवत्तई पप्फुल्लियई ॥८॥ [१३] गम्पिणु पास वईसरवि कबड़े गड-सयर करें वि । राहव-धरिणि किसोयरिए संवाहिय मन्दोयरिएँ ॥१॥ 'हले हल मा सीप किं मूढी । अरहि दुक्ष-महष्णवे छूढी ॥२॥ हले हले सीएँ साप करि बुत्ता । लह चुडर कण्डङ कडिसुत्तउ ॥३॥ हले हलें सीएँ सा जइ जाणहि । लइ घस्थ तम्बोलु समायहि ॥४॥ हल हलें सोए साए सुणु . वयणई ! अङ्ग पसाहाह अहि जयण ॥५|| इलें हलै मा सी' लइ दप्पण । घूति णिबद्धहि जाहि अपणु ॥६॥ हले हले सार साएँ अविभोलें हिं। चढ गयवरें हि गिन-गिलोले हि ॥७॥ हले हल सोएँ सीएँ उत्तॉ हि । चहु बहुलैहि हिंसन्स-तुरमहि ॥ हले हले सी सी महि भुजहि । माणुस-जम्महाँ फलु अणुहि ॥६॥ घत्ता पिउ इच्छहि पटु पडिग्छहि जइ सम्भावं हसिड पईं । तो लइ महएवि-पसाहाणु अमरिथम एसडउ मई ॥१०॥ [१४] सं णिसुणेवि विदेह-सुअ पभणह पुलय-विसह-भु। 'सच्चऊ इमि दावयणु अइ जिण-सासणे करइ मणु ॥३॥ इच्छमि जइ मह मुह ण णिहालइ । इण्डमि अणुवयाई जइ पालइ ॥२॥ इमि जइ मा मासु ण भसइ । इरमि णियय-सील जइ रक्खा ॥३॥ इच्छामि जह भीयउ मम्भीसह । इन्धमि जह पर-दम्बु ण हिसह ॥४॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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