SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 126
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ११८ पउमचरिउ ण गण हि लिहिलन्त हय पश्चल । ण गणइ रहवर कणय-समुजल ॥६॥ सगणई सालङ्कार स-गेउरु । मणहरु पिण्डवासु भन्तेउरु ॥७॥ ण गणइ जल-कालउ उजाणइ । जाणई जम्पाणई स-विमाण ॥८॥ सोयह वयणु एक्कु पर मण्णइ । भणमि पीवर जा आयण्णा ॥१॥ वत्ता जइ एम विपा किउ णिवारिक तो आयामिय-आइवहीं । रण हणुव तुमु पेक्खन्तहरे होमि सहमउ रामबही' :. [ ] तं णिसुणेप्पिणु पवण-सुउ स-रहसु पुलय-विसह-भुत । पडिणियत्त विवरम्मुहाउ गउ उज्वापाहाँ सम्मुहउ ।।१।। पट्टणु गिरवसेसु परिसेस चि । अवलोयणियह बलेंट गवेस वि ॥२॥ रबि-अत्यवणे सुहृल-चूडामगि । पवरुनाशु पहिउ पावणि ॥३॥ जं सुरवरतरूहि संकृण्ण ! मचिय-कलोहि रवण्णा था लबलीलय - सवा - णार हिं । चम्पय-वउस - तिलय पुण्णग्गहि ॥५॥ तरल - तमाल - ताल-तालरें हिं । मालइ - माहुलिश - मालरहि ।।६।। भुअ-एउमक्ख - दक्ख-खधरहि । काम - देवदार • कपरहि ॥७॥ वर - कामर - करीर-करवन्त हि । एला-ककोलेहि सुमन्दहि । पम्दण-वन्दहिं साहारहि । एव सरूहि अणेय पयारहि ॥६॥ पत्ता सहाँ वहाँ म हणुवम्सण सीय गिहालिय धुम्मणिय । मं गयण-मागें उम्मिझिय चन्द लेह वीयह तणिय ॥१०॥ [८] सहिय सहालहि परिपरिप णं व-देवय अवयरिय । शिल-मित्तु गऽवलास जा गिणिजइ काई वहें ॥॥
SR No.090355
Book TitlePaumchariu Part 3
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages261
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy