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________________ . २६ • यो पानावपरित . नमस्ते वोतमोहाय नमस्ते बन्धवे सताम् ! नमस्ते विश्वमाथाय नमस्ते कमेशनवे ॥१४॥ जितेन्द्रिय नमस्तुभ्यं चानन्तगुणशालिने । शरण्याय नमस्तुभ्यं धर्मतीर्थप्रवतिने ॥१५॥ स्तुस्वा नत्वेति तीर्थेशं सौधर्मेन्द्रोतिपुण्यशीः । ततस्तीर्थावहारस्य व्यपात्प्रस्तावनामिमाम् ॥६॥ अगरन् मध्यसस्यानां पिथ्यानावृष्टिशोषिणाम् । धर्मामृतप्रसेकेन तर्पय स्व सुमेघवद ॥६॥ भव्यमार्थाषिए स्वामिस्त्वं विश्वोचरणक्षमः । धर्मचकामदं सन्ज त्वज्जयोद्योगसाधनम् ॥६८।। मोहारिपृतनां देव निर्धूय मार्गरोधिनीम् । उपदेष्टु' हि सन्मार्ग ते कालोऽयमुपस्थितः ।।६।। सबिहारमिति प्रार्घ्य स्तुत्वा नत्वा मुहमुखः । विश्वसत्त्वहितायासौ भोऽभूधर्मसाझकर ।।७०॥ विश्वभहितोयुक्तः स्वयबुद्धोऽखिलावित् । जनाजानुग्रहं कतु मुत्तस्थेऽथ जिनाशुमान् ।।७।। को प्राप्त होता है फिर हे जिनेन्द्र ! जो समस्त सार्थक नामों से पापको स्तुति करता है बह सम्यग्दृष्टि शीघ्र ही क्या प्रापके समान नहीं हो जाता? प्रति अवश्य हो जाता है ॥४६-६३॥ इसलिये हे देव ! पापको नमस्कार हो। पाप ज्ञान की मूर्तिस्वरूप है प्रतः मापको नमस्कार हो । हे तीर्थपते ! प्राप जमत के हितकारी तथा प्रमन्त सुश से संपन्न है अतः प्रापको नमस्कार हो ॥६४॥ पाप मोह रहित हैं प्रतः प्रापको नमस्कार हो । प्राप सत्पुरुषों के बन्धु स्वरूप है प्रतः प्रापको नमस्कार हो । प्राप सब लोगों के स्वामी है पतः प्रापको नमस्कार हो और कमों के शत्रु हे प्रतः पापको नमस्कार हो ॥६५॥हे जितेन्द्रिय प्रापको नमस्कार हो । हे प्रनंत गुरणों से सुशोभित ! प्रापको नमस्कार हो । सब को तरण देने वाले तथा धर्मतीर्थ के प्रवर्ताने बाले मापको नमस्कार हो ॥६६॥ इस प्रकार अत्यंत पवित्र बुद्धि के धारक सौधर्मेन्द्र में तीर्थपति श्री पार्श्वनाथ मिनट की स्तुति कर उन्हें नमकार किया पश्चात् तीर्थ विहार की यह प्रार्थना की ॥६७॥ हे भगवन् ! प्राप उत्तम मेघ के समान मिष्यास्वरूपी अनावृष्टि से सूखते हुए भव्य गोवरूपी धान्य को धर्मरूपी जल के सेवन से संतुष्ट कीजिये ॥६॥हे भव्यसमूह के प्रधिपति स्वामिन् ! प्राप विश्व का उद्धार करने में समर्थ है, आपको विजय सम्बन्धी उद्योग का साधन स्वरूप यह धर्मचक्र तैयार है ॥६६॥ हे देव ! मोक्षमार्ग को रोकने वाली मोह शत्रु की सेना को नष्ट कर समीचीन मार्ग के उपदेश देने का आपका यह समय उपस्थित हुधा है ।।६।। प्रतः समस्त प्रारिणयों के हित के लिए बिहार कोजिए इस प्रकार प्रार्थना कर स्तुति कर तथा बार बार नमस्कार कर सौधर्मेन्द्र धर्म का सहायक हमा पर्यात गर्म तीर्थ की प्रवृत्ति में प्रेरक कारण हुमा ।७।। तदनन्तर समस्त भव्य जीवों का हित करने में तत्पर, स्वयंबुद्ध और समस्त पदार्थों के शाता पाय जिनेन्द्र रूपी सर्य जमता रूपी कमल का उपकार करने के लिए
SR No.090346
Book TitleParshvanath Charitam
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages328
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size9 MB
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