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________________ २७४ पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कत्तत्व (१) समयवाचक : अव - अब सिद्धनि का स्वरूप ध्याइये है। तब - (१) तब ऐसा उत्तम कार्य कैसे बने । (२) तब कुटुम्ब को मेलो भयो । जब-जब प्रश्न उपज है तब अति विनयवान होय प्रश्न • कर है। अबार - (१) तहाँ ठीक कीए ग्रंथ पाइए प्रचार हैं। (२) पर बैसे गुरु प्रबार दी नाहीं । सदा - देखे जाने ऐसी आत्मा विर्षे शक्ति सदा काल है । सर्वदा - ऐसी दशा सर्वदा रहे। कबहूँ - (१) कबहूँ पान दशा नहिं गहै । (२) कमहूँ तो जीव की इच्छा के अनुसार शरीर प्रवत्त हैं, कबहूँ शरीर की अवस्था अनुसार जीव प्रवत्तें है। अबहू - अनुसारी ग्रंथनितें शिवपंथ पाइ भव्य, ___ अबहू करि साधना स्वभाव सब भयो है । कदाचित् - कदाचित् मंदराग के उदयनै शुभोपयोग भी हो है । पहिले । पहिले जानै तब पीछे तैसे ही प्रतीत करी पीछ । श्रद्धानकों प्राप्त हो है । इदानी - इदानों जीवनिकी बुद्धि मंद बहुत है । एककाल - तीनों वेदनिविर्षे एकैकाल एक-एक ही प्रकृतिनि का ___बंध हो है। यावत् -- यावत् बंधान रहे तावत् साथ रहें । तावत् – यावत् बंधी स्थिति पूर्ण होय तावत् समय-समय तिस प्रकृति का उदय पाया ही करे ।
SR No.090341
Book TitlePandita Todarmal Vyaktitva aur Krititva
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHukamchand Bharilla
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year
Total Pages395
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, Biography, & Story
File Size7 MB
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