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________________ षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन समयरूप व्यवहार कालको ही मानो, निश्चयकाल कालाणु द्रव्य रूप कोई नहीं है? इसका समाधान आचार्य कहते हैं कि समय सबसे सूक्ष्म काल रूप प्रसिद्ध एक पर्याय है वह द्रव्य नहीं है। पर्याय इसलिये है कि समय उपजता विनशता है। कहा है 'समओ उप्पण्ण पद्धंसी' पर्याय बिना द्रव्यके नहीं हो सकती है। द्रव्य निश्चयसे अविनाशी होता है इसलिये कालकी समय पर्यायका उपादान कारण कालाणु रूप काल द्रव्य ही है पुद्गलादि नहीं है क्योंकि यह नियम है कि जैसा उपादान कारण होता है वैसा कार्य होता है, मिट्टीका पिंड जैसा होगा वैसा ही उसके उपादान कारणके समान घट बनेगा। और तो क्या ? काल शब्द ही परमार्थ कालका वाचक होनेसे अपने ही वाच्य परमार्थ कालके स्वरूपको स्थापित करता है। जैसे सिंह शब्द सिंह पदार्थको, सर्वज्ञ शब्द सर्वज्ञ पदार्थको, इन्द्र शब्द इन्द्र पदार्थको सिद्ध करता है। फिर भी संकोचते हुये निश्चय तथा व्यवहार कालका स्वरूप कहते हैं। समय आदि रूप सूक्ष्म व्यवहार कालका व घटिकादिरूप स्थूल व्यवहार कालका जो कोई उपादान कारण है तथा सो समय घटिकादिके भेदसे कहने योग्य व्यवहार कालकी भेदकल्पनासे रहित है, व जो तीनों कालोंमें रहनेवाला अनादि अनंत लोकाकाशके असंख्यात प्रदेशोंके प्रमाण असंख्यात कालाणुरूप भिन्न-भिन्न द्रव्य है सो निश्चय काल है । तथा जो निश्यचकालके उपादान कारणसे पैदा होने पर भी पुद्गल परमाणु व जल पात्रादिसे प्रगट होता है सो समय घटिका दिवस आदि रूपसे विशेष-विशेष व्यवहारकी कल्पनामें आनेवाला व्यवहार काल है । इस व्याख्यानमेंसे यह तात्पर्य लेना कि जिसका लाभ भूतके अनंत कालमें दुर्लभ रहा है ऐसा जो शुद्ध जीवास्तिकाय है उसीके ही चिदानंदमय एक स्वभावमें सम्यक् श्रद्धान करना चाहिये, उसीको रागादिसे भिन्न जानकर भेदज्ञान प्राप्त करना चाहिये तथा उसीमें ही रागादि विभाव रूप सर्व संकल्प विकल्प- जाल छोड़कर स्थिर चित्त करना चाहिये। इस तरह व्यवहारकालके व्याख्यानकी मुख्यत्तासे दो गाथाएँ पूर्ण हुईं। इस पंचास्तिकाय व छ; द्रव्यके प्ररूपण करनेवाले आठ अंतर अधिकार सहित प्रथम महा अधिकारमें निश्चय व्यवहारकालको कहनेवाला पाँच गाथाओंसे तीन स्थलद्वारा तीसरा अंतर अधिकार पूर्ण हुआ । इस प्रकार समय शब्दार्थपीठिका द्रव्यपीठिका व निश्चय व्यवहारकाल इन व्याख्यानोंकी मुख्यतासे तीन अंतर अधिकारों से छटनीस गाथाओंके द्वारा पीठिका समाप्त हुई।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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