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________________ २१ पंचास्तिकाय प्राभृत लोका काशप्रदेशप्रमाणकालाणुद्रव्यरूपः परमार्थकालः । यस्तु निश्चयकालोपादानकाग्णजन्यापि पुद्गलपरमाणुजलभाजनादिव्यज्यमानत्वात्समयघटिकादिवसादिरूपेण विवक्षितव्यवहारकल्पनारूप: म व्यवहारकाल इति । अ न्याख्यानेनीतानंतकाले दुर्लयो योग शुहजीवास्तिकायम्तस्मित्रैव चिदानंदैककालस्वाभावे सम्यकश्रद्धानं रागादिभ्यो भिन्नरूपेण भेदज्ञानं रागादिविभावरूपसमस्तसंकल्पविकल्पजालत्यागेन तत्रैव स्थिरचित्तं च कर्त्तव्यमिति तात्पर्याय: ।।२६।। इति व्यवहारकालव्याख्यानमुख्यत्वेन गाथाद्वयं गतं । अंत्र पंचास्तिकायषड्द्रव्यप्ररूपणप्रवणष्टांतराधिकारसहिंतप्रथममहाधिक्कारमध्ये निश्चयव्यवहारकालप्ररूपणाभिधानः पंचगाथाभिः स्थलत्रयेण तृतीयोतराधिकारो गतः । एवं समयशब्दार्थपीठिका द्रव्यपीठिका निश्चयव्यवहारकालव्याख्यानमुख्यतया चांतराधिकारत्रयेण षड्विंशतिगाथाभिः पंचास्तिकायपीठिका समाप्ता । हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा-२६ उत्थानिका-आगे पूर्व गाथामें जिस व्यवहारको किसी अपेक्षासे पराधीन कहा है वह किस तरह पराधीन है? इस प्रश्नके होते हुए युक्तिसे समझते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ-( मत्तारहिदं) मात्रा या परिमाणके बिना ( तु) तो (चिरं या खिप्पं ) देर या जल्दीका व्यवहार ( णस्थि) नहीं होता है । ( खलु) निश्चयसे ( सा वि मत्ता ) वह मात्रा भी ( पुग्गलदवेण) पुद्गल द्रध्यके ( बिना) बिना नहीं होती है ( तम्हा ) इसलिये ( कालो) काल ( पडुच्चभयो ) पुद्गलके निमित्तसे हुआ ऐसा कहा जाता है। विशेषार्थ-बहुत कालको चिर व थोड़े कालको क्षिप्र कहते हैं। लोकमें चिर या क्षिप्रका व्यवहार बिना मर्यादाके नहीं हो सकता। घड़ी प्रहर आदिके कालको जब चिरकाल कहेंगे तब उससे छोटे कालको क्षिप्रकाल कहेंगे। सूक्ष्मकाल एक समय है जो मंद गतिमें परिणमन करते हुद पुद्गलके परमाणुके बिना नहीं जाना जाता है। जो निमिष मात्र है वह आंखके पलक मारनेके बिना नहीं जाना जाता है। चिरकाल, घड़ी आदि घटिकाके निमित्त जलपात्र आदि द्रव्यके बिना नहीं जाने जाते हैं। इस कारण समय घटिकादि रूप सूक्ष्म या स्थूल व्यवहार काल यद्यपि निश्चयनयसे कालद्रव्यका पर्याय है तथापि व्यवहारसे परमाणु व जल आदि पुद्गल द्रव्यके आश्रय या निमित्तसे उत्पन्न होता है ऐसा कहा जाता है । जैसे निश्चय से पुगल पिंड रूप मिट्टी के उपादान कारणसे उत्पन्न जो घट सो व्यवहारसे कुभारके निमित्तसे बना होनेसे कुंभारसे किया गया ऐसा कहा जाता है तैसे ही समयादि व्यवहार काल यद्यपि निश्चयसे परमार्थ काल द्रव्यके उपादान कारणसे उत्पन्न हुआ है तथापि समयको निमित्तभूत परमाणु द्वारा या घटिकाको निमित्तभूत जलादि पुद्गल द्रव्य द्वारा प्रगट होने से पुद्गलसे उत्पन्न हुआ ऐसा कहा जाता है । फिर किसीने कहा
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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