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षड्द्रव्य - पंचास्तिकायवर्णन
न प्राप्त करता हुआ देखे सुने व अनुभव किये हुए आहार, भय, मैथुन, परिग्रह इन चार संज्ञाओंको आदि लेकर सर्व परभावोंके परिणामोंमें मूर्च्छित, मोहित या आसक्त होता हुआ नर-नरकादि विभाष पर्यायोंमें उत्पाद और व्यय करता रहता है तब इस जीवको शुद्ध आत्मद्रव्य सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान तथा अनुभव या ध्यान निरन्तर जिस तरह बने उस तरह करना योग्य है जिससे विभावोंमें भ्रमण न हो, यह तात्पर्य है ।। २१ ।।
इस तरह द्रव्यार्थिक नयसे नित्य होनेपर भी पर्यायार्थिक नयसे इस संसारी जीवके देव मनुष्यादि पर्यायोंके उत्पाद या नाशका कर्तापना है। इस व्याख्यानके संकोचकी मुख्यतासे चौथे स्थलमें गाथा पूर्ण हुई। इस तरह चार स्थलांसे दूसरा सप्तक पूर्ण किया। इस प्रकार पहली गाथा सप्तकमें जो पाँच स्थल कहे थे उनको लेकर नव अन्तर स्थलोंसे चौदह गाथाओंके द्वारा प्रथम महा अधिकारमें द्रव्यपीठिका नामका दूसरा अंतर अधिकार समाप्त हुआ ।
समय व्याख्या गाथा - २२
अत्र सामान्येनोक्तलक्षणानां षण्णां द्रव्याणां मध्यात् पञ्चानामस्तिकायत्वं व्यवस्थापितम् । जीवा पुग्गल - काया आयासं अस्थि - काइया सेसा |
अमया अत्थित्त मया कारण- भूदा हि लोगस्स ।। २२ ।। जीवाः पुलकाया आकाशमस्तिकायौ शेषौ ।
अमया अस्तित्वमायाः कारणाभूता हि लोकस्य ।। २२ ।।
अकृतत्वात् अस्तित्वमयत्वात् विचित्रात्मपरिणतिरूपस्य लोकस्य कारणत्वाच्चाभ्युपगम्यमानेषु षट्सु द्रव्येषु जीवपुद्गलाकाशधर्माधर्माः प्रदेशप्रचयात्मकत्वात् पंचास्तिकायाः न खलु कालस्तदभावादस्तिकाय इति सामर्थ्यादवसीयत इति । १२२ ।।
हिन्दी समय व्याख्या गाथा - २२
अन्वयार्थ – [ जीवाः ] जीव ( पुगलकायाः ) पुलकाय ( आकाशम्) आकाश और [ शेष अस्तिकाय ] शेष दो अस्तिकाय ( अमयाः ) अकृत हैं, ( अस्तित्वमयाः ) अस्तित्त्वमय हैं और (हि) वास्तवमें ( लोकस्य कारणभूताः ) लोकके कारणभूत हैं ।
टीका --- यहाँ ( इस गाथामें ), सामान्यतः जिनका स्वरूप ( पहले ) कहा गया है ऐसे छह द्रव्योंमेंसे पाँचको अस्तिकायपना स्थापित किया गया है।