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________________ ७६ षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन नाशको प्राप्त होता है इसलिये उसीको अभावका ( व्ययका ) कर्तृत्व कहा गया है, (३) सत् ( विद्यमान ) देवादिपर्यायका नाश करता है इसलिये उसीको भावाभावका ( सत्के विनाशका ) कर्तृत्व कहा गया है, और (४) फिरसे असत् ( अविद्यमान ) मनुष्यादिपर्याय्यका उत्पाद करता है इसलिये उसीको अभावभावका ( असत्के उत्पादका ) कर्तृत्व कहा गया है । -यह सब निरवद्य ( निर्दोष, निर्बाध, अविरुद्ध ) है क्योंकि द्रव्य और पर्यायोमें से एक की गौणतासे और अन्यकी मुख्यतासे कथन किया जाता है। वह इस प्रकार है जब जीव, पर्यायकी गौणतासे और द्रव्यकी मुख्यतासे विवक्षित होता है तब वह (१) उत्पन्न नहीं होता, (२) विनष्ट नहीं होता, (३) क्रमवृत्तिसे वर्तन नहीं करता इसलिये सत् ( विद्यमान ) पर्यायसमूहको विनष्ट नहीं करता और (४) असत्को ( अविद्यमान पर्यायसमूहको ) उत्पन्न नहीं करता, और जब जीव, द्रव्यकी गौणतासे तथा पर्यायकी मुख्यतासे विवक्षित होता है तब वह (१) उपजता है, (२) विनष्ट होता है, (३) जिसका स्वकाल वीत गया है ऐसे सत् ( विद्यमान ) पर्यायसमूहको विनष्ट करता है और (४) जिसका स्वकाल उपस्थित हुआ है ( आ पहुँचा है) ऐसे असत्को ( अविद्यमान पर्यायसमूहको ) उत्पन्न करता है । यह प्रसाद वास्तवमें अनेकान्तवादका है कि ऐसा विरोध भी ( सचमुच ) विरोध नहीं है ।।२१।। इस प्रकार षड् द्रव्यकी सामान्य प्ररूपणा समाप्त हुई। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा-२१ अथ जीवस्योत्पादव्ययसदुच्छेदासदुत्पादकर्तृत्वोपसंहारव्याख्यानमुद्योतयति,-एवं भावमभावं एवं पूर्वोक्तप्रकारेण द्रव्यार्थिकनयेन नित्यत्वेपि पर्यायार्थिकनयेन पूर्वं मनुष्यपर्यास्य अभावं-व्ययं कृत्वा पश्चाद्देवोत्पत्तिकाले भावं देवपर्यायस्योत्पादं कुणदि करोति । भावाभावं पुनरपि देवपर्यायच्यवनकाले विद्यमानस्य देवभवस्य पर्यायस्याभावं करोति । अभावभावं च पश्चान्मनुष्यपर्यायोत्पत्तिकाले अभावस्थाविद्यमानमनुष्यपर्यायस्य भावमुत्पादं करोति । स कः कर्ता । जीबोजीवः । कथंभूतः । गुणपज्जयेहि सहिदो -कुमतिज्ञानादिविभावगुणनरनारकादिविभावपर्यायसहितः न च केवलज्ञानादिस्वभावगुणसिद्धरूपशुद्धपर्यायसहित: । कस्मादिति चेत् ? तत्र केवलज्ञानाद्यवस्थायां नरनारकादिविभावपर्यायाणामसंभावत् अगुरुलघुकगुणषड्वानिवृद्धिस्वभावपर्यायरूपेण पुनस्तत्रापि भावाभावादिकं करोति नास्ति विरोधः किं कुर्वन् सन् मनुष्यभावादिकं करोति । संसरमाणो संसरन् परिभ्रमन् सन् । क्व । द्रव्यक्षेत्रकालभवभावस्वरूपपञ्चप्रकारसंसारे । अत्र सूत्रे विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावे साक्षादुपादेयभूते शुद्धजीवास्तिकाये यत्सम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणं तद्रुपनिश्चयरत्नत्रयात्मकं परमसामायिकं तदलभमानो दृष्टश्रुतरनुभूताहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञादिसमस्तपरभावपरिणाममूर्छितो मोहित आसक्त: सन् नरनारकादिविभावपर्यायरूपेण भावमुत्पादं करोति तथैव
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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