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________________ ६८ षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन एवं सतो विनाशोऽसतो जीवस्य नास्त्युत्पादः । तावज्जीवानां देवो मनुष्य इति गतिनाम ।।१९।। यदि हि जीवो य एव प्रियते स एव जायते, य एव जायते स एव नियते, तदेवं सतो विनाशोऽसत उत्पादश्च नास्तीति व्यवतिष्ठते । यत्तु देवो जायते मनुष्यो प्रियते इति व्यपदिश्यते तदवधृतकालदेवमनुष्यत्वपर्यायनिर्वर्तकस्य देवमनुष्यगतिनाम्नस्तन्मात्रत्वादविरुद्धम् । यथा हि महतो वेणुदण्डस्पैकस्य क्रमवृत्तीन्यनेकानि पाण्यात्मीयात्मीयप्रमाणावच्छिन्नत्वात् पर्वान्तरमगच्छन्ति स्वस्थानेषु भावभाभि परस्यानेधाभानि 'भयन्शि, देणुदण्डस्तु सर्वेष्वपि पर्वस्थानेषु भावभागपि पर्वान्तरसंबन्धेन पर्वान्तरसंबन्धाभावादभावभाग्भवति, तथा निरवधित्रिकालावस्थायिनो जीवद्रव्यस्यैकस्य क्रमवृत्तयोऽनेके मनुष्यत्वादिपर्याया आत्मीयात्मीयप्रमाणावछिन्नत्वात् पर्यायान्तरमगच्छन्तः स्वस्थानेषु भावभाजः परस्थानेष्वभावभाजो भवन्ति, जीवद्रव्यं तु सर्वपर्यायस्थानेषु भावभगपि पर्यायान्तरसंबन्येन पर्यायान्तरसंबन्धाभावभाग्भवति ।।१९।। हिन्दी समय व्याख्या गाथा-१९ ___ अन्वयार्थ ( एवं ) इस प्रकार ( जीवस्य ) जीवको ( सतः विनाशः ) सत्का विनाश और ( असतः उत्पादः ) असत्का उत्पाद ( न अस्ति ) नहीं है, ( देव जन्मता है और मनुष्य मरता है ऐसा कहा जाता है उसका यह कारण है कि ) ( जीवानाम् ) जीवोंको ( देव: मनुष्य: ) देव, मनुष्य ( इति गतिनाम ) ऐसा गतिनामकर्म ( तावत् ) उतने ही कालका होता है । टीका-यहाँ सत्का अविनाश और असत्का अनुत्पाद ध्रुवताके पक्षसे कहा है। यदि वास्तवमें जो जीव मरता है वही जन्मता है, और जो जीव जन्मता है वहीं मरता है, तो इस प्रकार सत्का विनाश और असत्का उत्पाद नहीं है ऐसा निश्चित होता है। और देव जन्मता है तथा मनुष्य मरता है ऐसा जो कहा जाता है वह ( भी ) अविरुद्ध है क्योंकि मर्यादित कालकी देवत्वपर्याय और मनुष्यत्वपर्यायको रचनेवाले देवगतिनामकर्म और मनुष्यगतिनामकर्म मात्र उतने काल जितने ही होते हैं। जिसप्रकार एक बड़े बाँसके क्रमवर्ती अनेक पर्व ( पोरे ) अपने-अपने मापमें मर्यादित होने से अन्य पर्व में न जाते हुए अपने-अपने स्थानोंमें भाववाले (विद्यमान ) हैं और परस्थानोंमें अभाववाले (-अविद्यमान) हैं तथा बाँस तो समस्त पर्वस्थानोंमे भाववाला होने पर भी अन्य पर्वके सम्बन्ध द्वारा अन्य पर्वके सम्बन्धका अभाव होनेसे अभाववाला ( भी ) है, उसीप्रकार निरवधि त्रिकाल स्थित रहनेवाले एक जीवद्रव्यकी क्रमवर्ती अनेक मनुष्यादिपर्यायें अपने-अपने मापमें मर्यादित होनेसे अन्य पर्यायमें न जाती हुई - अपने-अपने स्थानों में भाववाली हैं और परस्थानोंमें अभाववाली हैं तथा जीवद्रव्य तो
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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