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________________ ६४ पद्रव्य-पंचास्तिकाथवर्णन मनुष्यत्वेन नष्टो देही देवो भवति इतरो वा । उभयत्र जीवभावो न नश्यति न जायतेऽन्यः ।।१७।। प्रतिसमयसंभवदगुरुलघुगुणहानिवृद्धिनिर्वृत्तस्वभावपर्यायसंतत्यविच्छेदेनैकेन सोपाधिना मनुष्यत्वलक्षणेन पर्यायेण विनश्यति जीवः, तथाविधेन देवत्वलक्षणेन नारकतिर्यक्त्वलक्षणेन वान्येन पर्यायेणोत्पद्यते । न च मनुष्यत्वेन नाशे जीवत्वेनापि नश्यति, देवत्वादिनोत्पादे जीवत्वेनाप्युत्पद्यते, किं तु सदुच्छेदमसदुत्पादमन्तरेणेव तथा विवर्तत इति ।।१७।। हिन्दी समय व्याख्या गाथा-१७ अन्वयार्थ--( मनुष्यत्वेन ) मनुष्यत्वसे ( मनुष्य पर्याय से ) ( नष्टः ) नष्ट हुआ ( देही ) देही ( जीब ) ( देव: वा इतरः ) देव अथवा अन्य पर्याय रूप ( भवति ) होता है. ( अभयत्र ) उन दोनोंमें ( जीवभावः ) जीवभाव ( न नश्यति ) नष्ट नहीं होता और ( अन्य:) दूसरा जीवभाव ( न जायते ) उत्पन्न नहीं होता। टीका—'भावका नाश नहीं होता और अभावका उत्पाद नहीं होता' उसका यह उदाहरण प्रतिसमय होनेवाली अगुरुलघुगुणकी हानिवृद्धिसे उत्पन्न होनेवाली स्वभावपर्यायोंकी संततिका विच्छेद न करनेवाली एकसोपाधिक मनुष्यत्वस्वरूप पर्यायसे जीव विनाशको प्राप्त होता है और तथाविध ( स्वभावपर्यायोंके प्रवाहको न तोडनेवाली सोपाधिक ) देवत्वस्वरूप, नारकत्वस्वरूप या तिर्यश्चत्वस्वरूप अन्य पर्यायसे उत्पन्न होता है । वहाँ ऐसा नहीं है कि मनुष्यत्वसे विनष्ट होने पर जीवत्वसे भी नष्ट होता है और देवत्व आदिसे उत्पाद होने पर जीवत्वसे भी उत्पन्न होता है किन्तु सत्के उच्छेद और असत्के उत्पाद विना ही तदनुसार विवर्तन ( परिवर्तन, परिणमन ) करता है ।।१७।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा-१७ __ अथ पर्यायार्थिकनयेनोत्पादविनाशयोरपि द्रव्यार्थिकनयेनोत्पादविनाशौ न भवत इति समर्थयतिमणुसत्तणेण णट्ठो देही देवो व होदि इदरो वा-मनुष्यत्वेन मनुष्यपर्यायेण नष्टो विनष्टो मृतो देही संसारी जीव: पुण्यवशाद्देवो भवति स्वकीयकर्मवशादितरो वा नारकतिर्यग्मनुष्यो भवति । उभयत्थ जीवभावो ण णस्सदे ण जायदे अण्णो-उभयत्र कोर्थः मनुष्यभवे देवभवे वा पर्यायार्थिकनयेन मनुष्यभवे नष्टे द्रव्यार्थिकनयेन न विनश्यति तथैव पर्यायार्थिकनयेन देवपर्याये जाते सति द्रव्यार्थिकनयेनान्योऽपूर्वो न जायते नोत्पद्यते किंतु स एव । कोसौं ? जीवभावो जीवपदार्थः । एवं पर्यायार्थिकनयेनोत्पापदव्ययत्वेपि द्रव्यार्थिकनयेनोत्पादव्ययत्वं नास्तीति सिद्धं । अनेन व्याख्यानेन क्षणिकैकान्तमतं नित्यैकान्तमतं च निषिद्धमिति सूत्रार्थः ॥१७॥
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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