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________________ ३८२ मोक्षमार्ग प्रपंच सूचिका चूलिका विशेषार्थ-वीतराग सर्वज्ञ द्वारा कहे हुए जीव आदि पदार्थोके सम्बन्धमें भले प्रकार श्रद्धान करना तथा जानना ये दोनों सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान गृहस्थ और मुनियों में समान होते हैं परन्तु साधु तपस्वियोंका चारित्र आचारसार आदि चारित्र ग्रंथोंमें कहे हुए मार्गके अनुसार प्रमत्त और अप्रमत्त छते सातवें गुणस्थानके योग्य पाँच महाव्रत. पाँच समिति, तीन गुप्ति व छः आवश्यक आदि रूप होता है । गृहस्थोंका चारित्र उपासकाध्ययन शास्त्र में कही हुई रीतिके अनुसार पंचम गुणस्थानके योग्य दान, शील, पूजा या उपवास आदि रूप या दर्शन, व्रत आदि ग्यारह स्थानरूप होता है । यह व्यवहार मोक्षमार्गका लक्षण है। यह व्यवहार मोक्षमार्ग अपने और दूसरेके परिणमनके आश्रय है-इसमें साधन और साध्य भिन्न-भिन्न होते हैं, इसका ज्ञान व्यवहारनयके आश्रयसे होता है। जैसे सुवर्णपाषाणमेंसे सुवर्ण निकालनेके लिये अग्नि बाहरी साधक है तैसे यह व्यवहार मोक्षमार्ग निश्चयमोक्षमार्गका बाहरी साधक है-जो भव्य जीव निश्चयनयके द्वारा भिन्न साधन और साध्यको छोड़कर स्वयं ही अपने शुद्ध आत्मतत्त्वके भले प्रकार श्रद्धान, ज्ञान तथा अनुभवरूप अनुष्ठानमें परिणमन करता है वह निश्चयमोक्षमार्गका आश्रय करनेवाला है। उसके लिये भी यह व्यवहार मोक्षमार्ग बाहरी साधक है ।।१६०।। इस तरह निश्चयमोक्षमार्गके साधक व्यवहार मोक्षमार्गको कहते हुए पाँचवें स्थलमें गाथा पूर्ण हुई। व्यवहारमोक्षमार्गसाध्यभावेन निश्चयमोक्षमार्गोपन्यासोऽयम् । णिच्छय-णयेण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्या । ण कुणदि किंचिवि अण्णं ण मुयदि सो मोक्ख-मग्गो त्ति ।। १६१।। ___ निश्चयनयेन भणितस्त्रिभिस्तैः समाहितः खलु यः आत्मा । न करोति किंचिदप्यन्यन्न मुञ्चति स मोक्षमार्ग इति ।।१६१।। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसमाहित आत्मैव जीवस्वभावनियतचरित्रत्वान्निश्चयेन मोक्षमार्गः अथ खलु कथञ्चनानाद्यविद्याव्यपगमान्यवहारमोक्षमार्गमनुप्रपन्नो धर्मादितत्त्वार्थाश्रद्धानाङ्गपूर्वगतार्थाज्ञानातपश्चेष्टानां धर्मादितत्त्वार्थश्रद्धानाङ्गपूर्वगतार्थज्ञानतपश्चेष्टानाञ्च त्यागोपादानाय प्रारब्धविविक्तभावव्यापारः, कुतश्चिदुपादेयत्यागे त्याज्योपादाने च पुनः प्रवर्तितप्रतिविधानाभिप्रायो, यस्मिन्यावति काले विशिष्टभावनासौष्ठववशात्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैः स्वभावभूतैः सममङ्गाङ्गिभावपरिणत्या तत्समाहितो भूत्वा त्यागोपादानविकल्पशून्यत्त्वाद्विश्रान्तभावव्यापार: सुनिःप्रकम्पः अयमात्मावष्ठिते, तस्मिन् तावति काले अयमेवात्मा जीवस्वभावनियतचरित
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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