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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत ३८१ टीका-निश्चयमोक्षमार्गके साधनरूपसे, पूर्वोद्दिष्ट ( १०५वी गाथामें उल्लिखित ) व्यवहारमोक्षमार्गका यह निर्देश है। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र सो मोक्षमार्ग है । वहाँ, ( छह ) द्रव्यरूप और ( नव ) पदार्थरूप जिनके भेद हैं ऐसे धर्मादिके तत्त्वार्थश्रद्धानरूप भाव जिसका स्वभाव है ऐसा, 'श्रद्धान' नामका भावविशेष सो सम्यक्त्व, तत्त्वार्थश्रद्धानके सद्भावमें अंगपूर्वगत पदार्थोका अवबोधन ( - जानना ) सो ज्ञान, आचारादि सूत्रों द्वारा भेद रूप कहे गये अनेकविध मुनि-आचारोंके समस्त समुदायरूप तपमें चेष्टा (प्रवर्तन ) सो चारित्र, -ऐसा यह, स्वपरहेतुक पर्यायके आश्रित, भिन्नसाध्यसाधनभाववाले व्यवहारनयके आश्रयसे अनुसरण किया जानेवाला मोक्षमार्ग, सुवर्णपाषाणको लगाई जानेवाली प्रदीप्त अग्निकी भाँति, समाहित अंतरंगवाले जीवको ( अन्तर आत्मा को ) परम रम्य ऐसी ऊपर-ऊपरकी प्रत्येक शुद्ध भूमिकाओंमें अभिन्न विश्रांति ( -अभेदरूप स्थिरता ) उत्पन्न कराता हुआ— यद्यपि उत्तम सुवर्णकी भाँति शुद्ध जीव कथंचित् भिन्नसाध्यसाधनभावके अभावके कारण स्वयं ( अपने आप ) शुद्ध स्वभावसे परिणमित होता है तथापि-निश्चयमोक्षमार्गके साधनपनेको प्राप्त होता है ।।१६०|| संसा.-जब पद्याप पू लोकापवादारी काव्याख्यानप्रस्तावे "सम्मत्तं णाणजुदं" इत्यादि व्यवहारमोक्षमार्गो व्याख्यात; तथापि निश्चयमोक्षमार्गस्य साधकोयमिति ज्ञापनार्थ पुनरप्यभिधीयते, धर्मादिश्रद्धानं सम्यक्त्वं भवति, तेषामधिगमो ज्ञानं, द्वादशविधे तपसि चेष्टा चारित्रमिति । इतो विस्तरः । वीतरागसर्वज्ञप्रणीतजीवादिपदार्थविषये सम्यक् श्रद्धानं ज्ञानं चेत्युभयं गृहस्थतपोधनयोः समानं, चारित्रं तपोधनानामाचारादिचरणग्रंथविहितमार्गेण प्रमत्ताप्रमत्तगुणस्थानयोग्यं पंचमहाव्रतपंचसमितित्रिगप्तिषडावश्यकादिरूपं. गहस्थान पनरुपासकाध्ययनग्रंथविहितमार्गेण पंचमगणस्थानयोग्य दानशीलपूजोपवासादिरूपं दार्शनिकवतिकाद्येकादशनिलयरूपं वा इति व्यवहारमोक्षमार्गलक्षणं । अयं व्यवहारमोक्षमार्ग: स्वपरप्रत्ययपर्यायाश्रितं भिन्नसाध्यसाधनभावं व्यवहारनयमाश्रित्यानुगम्यमानो भव्यजीवस्य निश्चयनयेन भिन्नसाध्यसाधनभावाभावात्स्वयमेव निजशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपेण परिणममानस्यापि सुवर्णपाषाणस्याग्निरिव निश्चयमोक्षमार्गस्य बहिरंगसाधको भवतीति सूत्रार्थः ।।१६०।। एवं निश्चयमोक्षमार्गसाधकव्यवहारमोक्षमार्गकथनरूपेण पंचमस्थले गाथा गता। हिन्दी ता० --उत्थानिका-आगे यद्यपि पहले जीवादि नव पदार्थोंकी पीठिकाके व्याख्यानमें "सम्मत्तं णाणजुदं' इत्यादि व्यवहार मोक्षमार्गका व्याख्यान किया गया तथापि निश्चय मोक्षमार्गका यह व्यवहारमार्ग साधक है। ऐसा बतानेके लिये फिर भी कहते हैं अन्वय सहित सामान्यार्थ-[धम्मादी] धर्म आदि छः द्रव्योंका [सद्दहणं] श्रद्धान करना [ सम्पत्तं] सम्यक्त्व है। [अंगपुबगदं] ग्यारह अंग तथा चौदहपूर्वका जानना [णाणं] सम्यग्ज्ञान है। [तवम्हि ] तपमें [चिट्ठा] उद्योग करना [चरिया] चारित्र है [ववहारो मोक्खमग्गोत्ति ] यह व्यवहार मोक्षमार्ग है।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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