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________________ नवपदार्थ-मोक्षमार्ग वर्णन सं० ता०-अथ गाथाद्वयनं पापासवस्वरूपं निरूपयति, चरिया पमादबहुलानि:प्रमादचिच्चमत्कारपरिणतेः प्रतिबंधिनी प्रमादबहुला चर्या परिणतिश्चारित्रपरिणतिः, कालुस्संअकलुषचैतन्यचमत्कारमात्राद्विपरीता कालुष्यपरिणत्तिः । लोलदा य विसयेयु-विषयातीतात्मसुखसंवित्ते: प्रतिकूला विषयलौल्यपरिणतिः, परपरिदाव-परपरितापरहितशुद्धात्मानुभूतेर्विलक्षणा परपरितापपरिणतिः, अपवादो-निरपवादस्वसंवित्तेविपरीता परापवादपरिणतिश्चेति, पापस्स य आसवं कुणति-इयं पंचप्रकारा परिणतिव्यापापास्रबकारणभूता भावपापासवो भण्यते । भावपापासानिमित्तम मनोवचनकाययोगद्वारेणागतं द्रव्यकर्म द्रव्यमान इति मूत्रार्थ ।। ९२११ हिन्दी ता० -उत्थानिका-अब दो गाथाओंसे पापावका स्वरूप कहते हैं अन्वय सहित सामान्यार्थ-[पमादबहुला ] प्रमादसे भरी हुई [ चरिया ] क्रिया [ कालुस्सं ] चित्तका मलीनपना [य] और ( विसयेसु) इन्द्रियोंके विषयोंमें ( लोलदा) लोलुपता [य] तथा ( परपरितावपवादो) दूसरोंको दुःखी करना व उनकी निन्दा करना [ पावस्स ] पापकर्मका ( आसवं) आस्रव ( कुणदि) करते हैं। विशेषार्थ-प्रमादरहित चैतन्यके चमत्कारकी परिणतिको रोकनेवाली विषय कषायकी ओर झुकी हुई चारित्रकी परिणतिको प्रमादबहुला चर्या कहते हैं । मलीनता रहित चैतन्यके चमत्कारसे विपरीत भावको मलीन भाव या कलुषता कहते हैं । पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंसे दूरवर्ती आत्मसुखके अनुभवसे प्रतिकूल विषयोंमें अतिलोभके परिणामको विषयलोलुपता कहते हैं। दूसरोंको दुःख देनेसे रहित शुद्ध आत्मानुभवसे विलक्षण दूसरोंको कष्ट देनेरूप परिणामको परपरिताप कहते हैं । अपवादरहित स्वात्मानुभवसे विपरीत परकी निन्दा करने रूप भावको पर-अपवाद कहते हैं, इन पाँच प्रकारके भावोंको भाव पापास्रव कहते हैं क्योंकि ये द्रव्य पापोंके आस्रवके कारण हैं। भाव पापोंके निमित्तसे मन, वचन, कायके योगों द्वारा आए हुए द्रव्यकर्मको द्रव्य पापास्त्रव कहते हैं, यह सूत्रका अर्थ है ।।१३९।। पापास्रवभूतभावप्रपञ्चाख्यानमेतत् । सण्णाओ य तिलेस्सा इंदिय-वसदा य अत्त-रुद्दाणि । णाणं च दुप्पउत्तं मोहो पाप-प्पदा होति ।। १४०।। संज्ञाश्च त्रिलेश्या इन्द्रियवशता चार्तरौद्रे । - ज्ञानं च दुःप्रयुक्तं मोहः पापप्रदा भवन्ति ।।१४०।। तीव्रमोहविपाकप्रभवा आहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञाः, तीनकषायोदयानुरंजितयोगप्रवृत्तिरूपाः कृष्णनीलकापोतलेश्यास्तिवः, रागद्वेषोदयप्रकर्षादिन्द्रियाधीनत्वम्, रागद्वेषोद्रेकात्प्रियसंयोगा
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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