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________________ ३२२ नवपदार्थ - मोक्षमार्ग वर्णन भीतर जो विपरीत अभिप्रायरूप परिणाम होता है यह दर्शनमोह या मोह है। उसी ही आत्माके नाना प्रकार चारित्र मोहका उदय होते हुए, न निश्चय वीतराग चारित्र होता है और न व्यवहार व्रत आदिके परिणाम होते हैं ऐसे जीवके भीतर जो इष्ट पदार्थोंमें प्रीतिभाव सो राग है और अनिष्ट पदार्थोंमें अप्रीति भाव सो द्वेष है। उस ही मोहके मंद उदयसे जो मनकी विशुद्धि होना उसको चित्तप्रसाद कहते हैं । यहाँ मोह व द्वेष तथा विषयादिमें अशुभराग सो अशुभ भाव है तथा दान पूजा व्रत शील आदि रूप जो शुभ राग या चित्तका आह्लाद होना है सो शुभ भाव है यह सूत्रका अभिप्राय है ।। १३१ । । इसतरह शुभ तथा अशुभ परिणामको कहते हुए एक सूत्र से प्रथम स्थल पूर्ण हुआ । पुण्यपापस्वरूपाख्यानमेतत् । सुह- परिणामो पुण्णं असुहो पावं ति हवदि जीवस्स । 1 दोहं पोग्गल मेत्तो भावो कम्मत्तणं पत्तो ।। १३२ । । शुभपरिणामः पुण्यमशुभः पापमिति भवति जीव। द्वयोः पुङ्गलमात्रो भावः कर्मत्वं प्राप्तः ।। १३२ ।। जीवस्य कर्तुः निश्चयकर्मतामापन्नः शुभपरिणामो द्रव्यपुण्यस्य निमित्तमात्रत्वेन कारणीभूतत्वात्तदास्रवक्षणादूर्ध्वं भवति भावपुण्यम् । एवं जीवस्य कर्तुर्निश्चयकर्मतामापन्नोऽशुभपरिणामो द्रव्यपापस्य निमित्तमात्रत्वेन कारणीभूतत्वात्तदास्त्रवक्षणादूर्ध्वं भावपापम् । पुद्गलस्य कर्तुर्निश्चयकर्मतामापन्नो विशिष्टप्रकृतित्वपरिणामो जीवशुभपरिणामनिमित्तो द्रव्यपुण्यम् । पुद्गलस्य कर्तुर्निश्चयकर्मतामापन्नो विशिष्टप्रकृतित्वपरिणामो जीवाशुभपरिणामनिमित्तो द्रव्यपापम् । एवं व्यवहारनिश्चयाभ्यामात्मनो मूर्तममूर्तञ्ज कर्म प्रज्ञापितमिति । । १३२ । । अन्वयार्थ--( जीवस्य ) जीवके ( शुभपरिणाम: ) शुभपरिणाम ( पुण्यम् ) पुण्य हैं और ( अशुभः ) अशुभ परिणाम ( पापम् इति भवति ) पाप हैं ( द्वयो: ) उन दोनोंके द्वारा ( पुद्गलमात्र: भावः ) पुद्गलमात्र भाव ( कर्मत्वं प्राप्तः ) कर्मपनेको प्राप्त होते हैं । टीका – यह, पुण्य-पापके स्वरूपका कथन है । जीवरूप कर्ताके निश्चयकर्मभूत शुभपरिणाम द्रव्यपुण्यको निमित्तमात्ररूपसे कारणभूत हैं। इसलिये 'द्रव्यपुण्यास्रवके' पूर्व वे शुभपरिणाम 'भावपुण्य' होते हैं। इसी प्रकार जीवरूप कर्ता निश्चयकर्मभूत अशुभपरिणाम द्रव्यपापको निमित्तमात्ररूपसे कारणभूत हैं इसलिये द्रव्यपापावके, वे अशुभ पूर्व परिणाम 'भावपाप' होते हैं। पुद्गलरूप कर्त्ताके निश्चयकर्मभूत विशिष्टप्रकृतिरूप परिणाम (सातावेदनीयादि मुख्य प्रकृतिरूप
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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