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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २६९ 'पंचास्तिकाग्रसंग्रहको' (विज्ञाय ) जानकर [ : ] जो ( रागद्वेषौ ) रागद्वेषको [ मुञ्चति ] छोड़ता हैं, ( स ) वह ( दुःखपरिमोक्षम् गाहते ) दुःखसे परिमुक्त होता है । टीका—यहाँ पंचास्तिकायके अवबोधका फल कहकर पंचास्तिकायके व्याख्यानका उपसंहार किया गया है ! वास्तवमें सम्पूर्ण प्रवचन कालसहित पंचास्तिकायसे अन्य कुछ भी प्रतिपादित नहीं करता, इसलिये प्रवचनका सार ही यह 'पंचास्तिकायसंग्रह' है । जो पुरुष समस्तवस्तुतत्त्वका कथन करनेवाले इस 'पंचास्तिकायसंग्रह' को अर्थत: ( अर्थानुसार यथार्थ रीति से ) अर्धीरूपसे ( हित प्राप्ति के हेतु से ) जानकर, इसीमें कहे हुए जीवास्तिकायमें अन्तर्गत स्थित अपनेको (निज आत्माको ) स्वरूपसे अत्यन्त विशुद्ध चैतन्यस्वभाववाला निश्चित करके परस्पर कार्यकारणभूत ऐसे अनादि रागद्वेषपरिणाम और कर्मबंधकी परम्परासे आरोपित स्वरूपविकारको उस काल अनुभव में आता देखकर, उस समय विवेकज्योति प्रगट होनेसे कर्मबंधकी परम्पराका प्रवर्तन करनेवाली रागद्वेषपरिणतिको छोड़ता है, वह पुरुष, वास्तवमें जिसका स्नेह जीर्ण होता जाता हैं ऐसा, परमाणुकी भाँति जधन्य स्नेहगुणके सन्मुख वर्तते हुये भावी बंधसे पराङ्मुख वर्तता हुआ - पूर्व बन्धसे छूटता हुआ, अग्नितप्त जलकी दु:स्थिति ( खदबद होना ) समान जो दुःख उससे परिमुक्त होता है ॥ १०३॥ सं०ता०-अथ पंचास्तिकायाध्ययनस्य मुख्यवृत्या तदंतर्गतशुद्धजीवास्तिकायपरिज्ञानस्य वा फलं दर्शयति, एवं पूर्वोक्तप्रकारेण वियाणित्ता - विज्ञाय पूर्वं । कं । पंचत्थियसंग्रहं – पंचास्तिकायसंग्रहनामसंज्ञं ग्रंथं । किंविशिष्टं । पवद्यणसारं — प्रवचनसारं पंचास्तिकायषद्द्रव्याणां संक्षेपप्रतिपादकत्वात् मुख्यवृत्त्या परमसमाधिरतानां मोक्षमार्गत्वेन सारभूतस्य शुद्धजीवास्तिकायस्य प्रतिपादकत्वाद्वा द्वादशांगरूपेण विस्तीर्णस्यपि प्रवचनस्य सारभूतं एवं विज्ञाय । किं करोति । जो मुयदि-यः कर्ता मुंचति । क कर्मतापन्नी । रायदोसे - अनंतज्ञानादिगुणसहितवीतरागपरमात्मनो विलक्षण हर्षविलक्षण भाविरागादिदोषोत्पादककर्मास्रवजनकौ च रागद्वेषौ द्वौ । सो-स: पूर्वोक्तः ध्याता, गाहदि-गाहते प्राप्नोति । कं । दुक्खपरिमोक्खं निर्विकारात्मोपलब्धिभावनोत्पन्नपरमाह्लादैकलक्षणसुखामृतविपरीतस्य नानाप्रकारशारीरमानसरूपस्य चतुर्गतिदुःखस्य परिमोक्षं मोचनं विनाशमित्यभिप्रायः ।। १०३ ॥ हिंदी ता० - उत्थानिका- आगे पंचास्तिकायको पढ़ने का फल व मुख्यतासे इनमें अंतर्भूत जो शुद्ध जीवास्तिकाय है उसके ज्ञानका फल दिखलाते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ - [ एवं ] इसतरह [ पंचत्थियसंगहं ] पंचास्तिकायका संग्रहरूप [ पवयणसारं ] इस परमागमको [ दियाणित्ता ] जानकरके [ जो ] जो कोई [ रागदोसे ]
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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