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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २५७ द्रव्याणां मूर्तीमूर्तत्वं चेतनाचेतनत्वं प्रतिपादयति, स्पर्शरसगंधवर्णवत्या मूर्त्या रहितत्वादमूर्ता भवन्ति । ते के। आकाशकालजीवधर्माधर्माः किंतु जीवो यद्यपि निश्चयेनामूर्ताखंडैकप्रतिभासमयत्वादमूर्तस्तथापि रागादिरहितसहजानंदैकस्वभावात्मतत्त्वभावनारहितेन जीवेन यदुपार्जितं मूर्तं कर्म तत्संसर्गाद्व्यवहारेण मूर्तोपि भवति स्पर्शरसगंधवर्णवत्त्वान्मूर्त पुद्गलद्रव्यं संशयादिरहितत्वस्वपरपरिच्छित्तिसमर्थानंतचैतन्यपरिणतत्त्वाज्जीवः खलु चेतकस्तेषु स्वपरप्रकाशकचैतन्याभावत् शेषाण्यचेतनानीति भावार्थ: ॥९७|| एवं चेतनाचेतनमूर्तीमूर्तप्रतिपादनमुख्यत्वेन गाथासूत्रं गतं । हिंदी ता० उत्थानिका- आगे आठ गाथाओंतक पांच अस्तिकाय और छ द्रव्यकी चूलिकाका व्याख्यान करते हैं। इन आठ गाथाओंके मध्यमें चेतन, अचेतन, मूर्तिक व अमूर्तिकurst कनेकी मुख्यतासे “आयास" इत्यादि गाथा सूत्र एक है फिर सक्रियपना और निष्क्रियपना कहनेकी मुख्यतासे "जीवा मोग्गलकाया" इत्यादि सूत्र एक है फिर अमूर्तका लक्षण कहते हुए 'जे खलु इंदियगेज्जा' इत्यादि सूत्र एक है। फिर नव जीर्ण पर्यायकी स्थितिरूप व्यवहारकाल है तथा जीव पुद्गलादिकोंकी पर्यायकी परिणतिमें सहकारी कारण निश्चयकाल है। इस तरह दोनों प्रकारके कालके व्याख्यानकी मुख्यतासे "कालो परिणामभवो' इत्यादि गाथाएँ दो हैं उसी कालमें द्रव्यका लक्षण संभव होता है इससे उसमें द्रव्यपना है तथा द्वितीय आदि प्रदेश नहीं है इससे अकायपना है, ऐसा कहनेकी मुख्यतासे "एदे कालागासा' इत्यादि सूत्र एक है। फिर पांच अस्तिकायोंके भीतर केवलज्ञान व केवलदर्शनरूप शुद्ध जीवास्तिकाय गर्भित है । वह जब वीतराग निर्विकल्प समाधिमें परिणमन करता है तब निश्चय मोक्षमार्गरूप होता है। इस निश्चय मोक्षमार्ग की भावनाका फल कहते हुए 'एवं पवयणसारं' इत्यादि गाथाएं दो हैं । इसतरह आठ गाथाओंसे छः स्थलोंके द्वारा चूलिकामें समुदायपातनिका कही । अब द्रव्योंके मूर्त अमूर्तपनेको व चेतन अचेतनपेनको कहते हैं अन्यसहित सामान्यार्थ - ( आगासकालजीवा) आकाश, काल, जीव ( धम्माधम्मा ) धर्म और अधर्म ( मुत्तिपरिहीणा ) मूर्तिरहित अमूर्तिक हैं, ( घोग्गलदव्वं ) पुङ्गलद्रव्य ( मुत्तं ) मूर्तिक है। ( तेसु) इन छहों में ( खलु ) निश्चयसे ( जीवो ) जीव द्रव्य ( चेदणो ) चेतन है । विशेषार्थ - जिसमें स्पर्श रस गंध वर्ण हो उसको मूर्तिक कहते हैं व जिनमें ये गुण न हों उनको अमूर्तिक कहते हैं। वे अमूर्तिक द्रव्य पुनलको छोड़कर पाँच है । यद्यपि जीव निश्चयसे अमूर्तिक अखंड एक प्रतिभास-मयपनेसे अमूर्तिक है तथापि रागादिरहित सहज
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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