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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २४५ देखनेमें आती है, इसलिये अनुमान हो सकता है कि वे [ धर्म-अधर्म ] गति-स्थितिके मुख्य हेतु नहीं हैं, किन्तु व्यवहारनयस्थापित ! ब्यानहारनन नाग स्थापित-कथित ) उदासीन हेतु प्रश्न-ऐसा हो तो गतिस्थितिमान पदार्थोंको गतिस्थिति किस प्रकार होती है ? उत्तर-वास्तवमें समस्त गतिस्थितिमान पदार्थ अपने परिणामोंसे ही निश्चयसे गतिस्थिति करते हैं ॥८९|| इस प्रकार धर्मद्रव्यास्तिकाय और अधर्मद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान समाप्त हुआ। सं० ता०-अथ धर्माधर्मयोर्गतिस्थितिहेतुत्वोदासीनविषये युक्तिमुद्योतयति,-विद्यते येषां गमनं स्थानं पुनस्तेषामेव संभवति ते जीवपुद्गला: स्वकपरिणामैरेव स्थानं गमनं च कुर्वतीति । तथाहि-~-धर्मस्तावत्क्वापि काले गतिहेतुत्वं न त्यजति न चाधर्मः स्थितिहेतुत्वं, तो यदि गतिस्थित्योर्मुख्यहेतू स्यातां तदा गतिस्थितिकाले परस्परं मत्सरो भवति । कथमिति चेत् ? येषां गतिस्तेषां सर्वदैव गतिरेव न च स्थिति; येषां पुनः स्थितिस्तेषां सर्वदैव स्थितिरेव न च गतिः । न तथा दृश्यते । किंतु ये गतिं कर्वन्ति त एव पुनरपि स्थितिं कुर्वन्ति, ये स्थितिं कुर्वन्ति त एव पुनर्गतिं कुर्वन्ति । ततो ज्ञायते न तो धर्माधर्मी गतिस्थित्योर्मुख्यहेतू । यदि मुख्यहेतू न भवेतां तर्हि गतिस्थितिमतां जीवपुद्गलानां कथं गतिस्थिती इति चेत् ? ते निश्चयेन स्वकीयपरिणामैरेव गतिं स्थितिं च कुर्वतीति । अत्र सूत्रे निर्विकारचिदानंदैकस्वभावादुपादेयभूतात् शुद्धात्मतत्त्वाद्भिन्नत्वाद्धेयतत्त्वमित्यभिप्रायः ।।८९।। एवं धर्माधर्मोभयव्यवस्थापनमुख्यत्वेन तृतीयस्थले गाथात्रयं गतं । इति गाथासप्तकपर्यंतं स्थलत्रयेण पंचास्तिकायषड्द्र्व्य प्रतिपादकप्रथममहाधिकारमध्ये धर्माधर्मव्याख्यानरूपेण षष्ठांतराधिकारः समाप्तः ।। हिंदी ता०-उत्यानिका-आगे फिर प्रकट करते हैं कि धर्म और अथर्म गति और स्थितिके करनेमें बिलकुल उदासीन हैं अन्वय सहित सामान्यार्थ-(जेसिं) जिन जीव और पुद्गलोंका ( गमणं ) गमन ( पुण) तथा ( ठाणं) ठहरना ( विज्जदि) होता है ( तेसिमेव ) उन्हींका गमन व ठहराव ( संभवदि) संभव है (ते) वे जीव और पुद्गल ( सगपरिणामेहिंदु) अपनी ही गमन और स्थितिके परिणमनकी शक्तिसे ( गमणं ठाणं च ) गमन और ठहराव ( कुव्वंति ) करते रहते हैं। विशेषार्थ-धर्मद्रध्य कभी अपने ग़मनहेतुपनेको छोड़ता नहीं है तैसे ही अधर्म कभी स्थिति हेतुपनेको छोड़ता नहीं है । यदि ये ही गमन और स्थिति करानेमें मुख्य प्रेरक कारण हो जावें तो गति और स्थितिमें परस्पर ईर्षा हो जावे। जिन द्रव्योंकी गति हो वे सदा ही चलते रहें और जिनकी स्थिति हो वे सदा ठहरे ही रहें उनकी कभी गति न हो। ऐसा नहीं
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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