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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २३९ भांति कारणभूत है और यह ( अधर्मास्तिकाय ) स्थितिक्रियायुक्तको पृथ्वीकी मांति कारण भूत है। जिस प्रकार पृथ्वी स्वयं पहलेसे ही स्थितिरूप ( स्थिर ) वर्तती हुई तथा परको स्थिति ( स्थिरता ) न कराती हुई, स्वयमेव स्थितिरूपसे परिणमित अश्वादिकको उदासीन अविनाभावी सहायरूप कारणमात्रकी भांति स्थिति में अनुग्रह करती है, उसी प्रकार [ अधर्मास्तिकाय ] भी स्वयं पहले ही स्थितिरूपसे वर्तता हुआ, और परको स्थिति न कराता हुआ, स्वयमेव स्थितिरूप परिणमित होते हा पुदलोंको उदासीन अविनाभावी सहायरूप कारणामात्रपनेसे स्थितिमें अनुग्रह करता है ।।८६।। संता०-अथाधर्मास्तिकायस्वरूपं कथ्यते,—यथा भवति धर्मद्रव्यं तथार्थ कर्तुं जानीहि हे शिष्य द्रव्यमधर्माख्यं । तच्च कथंभूतं । स्थितिक्रियायुक्तानां कारणभूतं पृथिवीवत्। तथाहियथा पूर्वमरसादिविशेषणविशिष्टं धर्मद्रव्यं व्याख्यातं तथा अधर्मद्रव्यमपि तद्रूपं ज्ञातव्यं, अयं तु विशेषः तन्मत्स्यानां जलवज्जीवपुद्गलानां गतेर्बहिरंगसहकारिकारणम् इदं तु यथा पृथिवी स्वयं पूर्वं तिष्ठंती पर स्थापयंती तुरंगादीनां स्थितेर्बहिरंगसहकारिकारणं भवति तथा जीवपुद्गलानां स्थापयत्स्वयं च पूर्व तिष्ठत्सत् स्थितेस्तेषां कारणमिति पथिकानां छायावद्वा । अथवा शुद्धात्मस्वरूपे या स्थितिस्तस्या निश्चयेन वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनं कारणं व्यवहारेण पुनरहत्सिद्धादिपरमेष्ठिगुणस्मरणं च यथा तथा जीवपुद्गलानां निश्चयेन स्वकीयस्वरूपमेव स्थितेरूपादानकारणं व्यवहारेण पुनरधर्मद्रव्यं चेति सूत्रार्थः ।।८६।। एकमधर्मद्रव्यव्याख्यानरूपेण द्वितीयस्थले गाथासूत्रमेकं गतं । हिंदी ता०-उत्थानिका-आगे अधर्मास्तिकायको कहते हैं अन्वय सहित सामान्यार्थ-[तु] तथा [जह ] जैसे [ धम्मदव्यं ] धर्मद्रव्य [ हवदि ] है [ तह ] तैसे [तं] उस [ अयमक्खं ] अधर्म नामके [दव्यं ] द्रव्यको [जाणेह ] जानो जो [ पुढवीव ] पृथ्वीके समान [ठिदिकिरियाजुत्ताणं] स्थिति क्रिया करते हुए जीव पुद्गलोंको [कारणभूदं ] निमित्त कारण है। विशेषार्थ-जैसे पहिले धर्मद्रव्यके सम्बन्धमें कहा था कि वह रस आदिसे रहित अमूर्तिक है, नित्य है, अकृत्रिम है, परिणमनशील है, व लोकव्यापी है तैसे ही अधर्म द्रव्यको जानना चाहिये । विशेष यह है कि धर्मद्रव्य तो मछलियोंके लिये जलकी तरह जीव पुगलोंके गमनमें बाहरी सहकारी कारण है । यह अधर्म द्रव्य जैसे पृथिवी स्वयं पहलेसे ठहरी हुई दूसरोंको न ठहराती हुई घोड़े आदिकोंके ठहरनेमें बाहरी सहकारी कारण है वैसे स्वयं पहलेसे ही ठहरा हुआ व जीव पुनलोंको न ठहराता हुआ उनके स्वयं ठहरते हुए उनके ठहरने में सहकारी कारण है । अथवा जैसे छाया पथिकोंके ठहरने में कारण होती है अथवा जैसे शुद्ध आत्म स्वरूपमें जो ठहरना है उसका निश्चयनयसे वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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